दिल्ली के सिरी इंस्टीट्यूशनल एरिया में स्थित नेशनल कोऑपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया (NCUI) के दफ्तर से 4 अगस्त 2026 को एक चिट्ठी निकली। भेजने वाले थे NCUI के कार्यकारी निदेशक राजीव शर्मा, और पाने वाले थे देश भर के राज्य सहकारी संघ, ज़िला सहकारी संघ, मल्टी-स्टेट सोसाइटी और सहकारी बैंकों के प्रमुख। विषय था — “साइबर सिक्योरिटी एंड फ्रॉड प्रिवेंशन ट्रेनिंग प्रोग्राम” — यानी NCUI साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण, जो 9 से 11 सितंबर 2026 तक दिल्ली स्थित नेशनल सेंटर फॉर कोऑपरेटिव एजुकेशन (NCCE) में होने जा रहा है। पहली नज़र में यह एक रूटीन सरकारी सूचना जैसी लग सकती है — तीन दिन की ट्रेनिंग, कुछ हज़ार रुपये फीस, नामांकन फॉर्म। लेकिन जिस समय यह पत्र लिखा गया, उसी दौर में देश के सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे घोटालों और साइबर धोखाधड़ी के आंकड़े यह बता रहे हैं कि यह कोर्स महज़ एक और सरकारी प्रशिक्षण नहीं, बल्कि एक ज़रूरी चेतावनी है।
करोड़ों के घोटाले, टूटता भरोसा
पिछले कुछ बरसों में सहकारी बैंकों से जुड़े जो मामले सुर्खियों में आए हैं, वे किसी को भी चौंका सकते हैं। मुंबई के न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक में करीब ₹122 करोड़ की गड़बड़ी सामने आई, जिसमें बैंक के तत्कालीन चेयरमैन हेमंत शाह पर आरोप है कि उन्होंने ₹45 करोड़ विदेशी संस्थाओं में डायवर्ट किए, जबकि जनरल मैनेजर हितेश मेहता पर छह साल तक लगातार पैसा निकालने का आरोप है। बैंक के 2,000 से ज़्यादा संदिग्ध लोन और करीब ₹400 करोड़ के एनपीए अब भी जांच के दायरे में हैं। इससे पहले 2019 में पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (PMC) बैंक का मामला देश भर में चर्चा में रहा था, जहां हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (HDIL) को दिए गए फर्जी लोन के ज़रिए करीब ₹4,000 करोड़ बैंक से निकाले गए — अकेले HDIL का बैंक के कुल लोन पोर्टफोलियो में हिस्सा 73% था। लाखों जमाकर्ता वर्षों तक अपने पैसे के लिए भटकते रहे, आखिरकार यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक ने PMC बैंक का अधिग्रहण किया। केरल के अंगमाली अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में ₹96 करोड़ की धोखाधड़ी सामने आई, तो त्रिशूर के करुवन्नूर बैंक में पहले से गिरवी रखे दस्तावेज़ों पर दोबारा कर्ज़ लेने जैसे तरीके अपनाए गए। इन मामलों में एक बात कॉमन है — निगरानी की दरार। सहकारी बैंकों की बैंकिंग गतिविधियां रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के दायरे में आती हैं, जबकि प्रशासनिक और प्रबंधकीय पक्ष राज्य के रजिस्ट्रार के हाथ में रहता है। यही दोहरी निगरानी व्यवस्था — जिसे कई विश्लेषक “फ्रैक्चर्ड रेगुलेशन” कहते हैं — फ्रॉड करने वालों को बच निकलने की जगह देती रहती है।
सिर्फ बैंक नहीं, पूरे देश में डिजिटल धोखाधड़ी की बाढ़
यह समस्या अकेले सहकारी बैंकों की नहीं है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में देश भर में साइबर अपराध के 28.15 लाख मामले दर्ज हुए, जो 2024 के 22.68 लाख मामलों से 24% ज़्यादा हैं। इनमें कुल ₹22,495 करोड़ का नुकसान हुआ, जिसमें से 76% रकम अकेले फर्जी निवेश स्कीमों (इन्वेस्टमेंट स्कैम) में डूबी। भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के ज़रिए अब तक ₹8,031 करोड़ की फर्जी ट्रांजैक्शन रोकी भी जा चुकी है, लेकिन यह लड़ाई अभी भी एकतरफा दिखती है। डिजिटल पेमेंट के मामले में तस्वीर और साफ होती है। जन-सर्वेक्षण मंच लोकलसर्किल्स ने 365 ज़िलों के 32,000 से ज़्यादा UPI उपयोगकर्ताओं से बात की, तो पता चला कि हर पांच में से एक परिवार को पिछले तीन साल में कम-से-कम एक बार UPI फ्रॉड का सामना करना पड़ा — और इनमें से 51% पीड़ितों ने इसकी शिकायत तक दर्ज नहीं कराई, चाहे वह बैंक हो, पुलिस हो, NPCI हो या RBI। सर्वे में सामने आया कि आधे मामलों में हैक हुए UPI सेटिंग्स या PIN से पैसे निकाले गए, 40% मामलों में फर्जी पेमेंट लिंक के ज़रिए ठगी हुई, और 20% मामलों में लोगों ने खुद OTP या PIN किसी “बैंक अधिकारी” बनकर आए ठग को बता दिया। RBI के अपने आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के 13,516 मामलों में ₹520 करोड़ का नुकसान हुआ, जो कुल बैंकिंग फ्रॉड का 56.5% है। गौर करने वाली बात यह है कि UPI लेनदेन का आकार भी उसी रफ्तार से बढ़ा है — 2024-25 में UPI से 185.8 अरब लेनदेन हुए, यानी पिछले साल से 41.7% ज़्यादा, और यह देश के कुल डिजिटल भुगतान का 83.4% हिस्सा है। मतलब साफ है: जितना डिजिटल लेनदेन बढ़ रहा है, धोखाधड़ी के मौके भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रहे हैं — और सहकारी बैंक इससे अछूते नहीं हैं।
RBI की तैयारी: फ्रेमवर्क से लेकर राहत योजना तक
RBI इस खतरे से अनजान नहीं है। सहकारी बैंकों के लिए RBI ने पहले ही “बेसिक साइबर सिक्योरिटी फ्रेमवर्क फॉर प्राइमरी (अर्बन) कोऑपरेटिव बैंक्स” जारी कर रखा है, जो बैंकों के आकार और डिजिटल जोखिम के हिसाब से अलग-अलग स्तर (ग्रेडेड अप्रोच) पर सुरक्षा मानक तय करता है। हाल ही में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट (2025-26) में RBI ने 2026-27 के लिए शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) से जुड़ा एक विस्तृत निगरानी एजेंडा भी तय किया है, जिसमें साइबर सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के लेवल 2, 3 और 4 पर काम कर रहे बैंकों के लिए “साइबर मैपिंग एक्सरसाइज़”, अपडेटेड साइबर सिक्योरिटी गाइडलाइन (जो जल्द सार्वजनिक परामर्श के लिए आएगी), और “मिशन साक्षम” के तहत इन-पर्सन वर्कशॉप व ई-लर्निंग के ज़रिए स्टाफ की क्षमता बढ़ाने की योजना शामिल है। ग्राहकों के लिए भी RBI एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाली नई व्यवस्था के तहत, बैंक की लापरवाही साबित होने पर या पांच दिन के भीतर शिकायत दर्ज कराए गए थर्ड-पार्टी फ्रॉड के मामलों में ग्राहकों को “ज़ीरो लायबिलिटी” मिलेगी, यानी उन्हें कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। बाकी योग्य मामलों में ₹50,000 तक के नुकसान का 85% या अधिकतम ₹25,000 तक की भरपाई का प्रावधान होगा। ₹500 से ऊपर के हर लेनदेन पर SMS अलर्ट अनिवार्य होगा, और शिकायत बैंक के साथ-साथ नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930) पर भी पांच दिन के भीतर दर्ज करानी होगी। बैंकों को 45 दिन (घरेलू मामलों में) और 60 दिन (सीमा-पार मामलों में) के भीतर शिकायत का निपटारा करना होगा। यानी नियामक स्तर पर ढांचा तैयार हो रहा है। लेकिन कोई भी फ्रेमवर्क या राहत योजना तभी काम करती है जब बैंक और सोसाइटी के भीतर बैठा स्टाफ — जो रोज़ाना ग्राहकों, लेनदेन और डेटा से सीधे जूझता है — उसे समझे और लागू कर सके। यहीं NCUI की यह ट्रेनिंग अहम हो जाती है।
तीन दिन में क्या सिखाया जाएगा
यह NCUI साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण 9 से 11 सितंबर 2026 तक दिल्ली के NCUI परिसर में होगा। पत्र के मुताबिक इसमें सहकारी बैंकों और संबद्ध संस्थाओं के कर्मचारियों को सात मुख्य विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा — साइबर सुरक्षा की बुनियादी समझ, फिशिंग ईमेल और ऑनलाइन स्कैम पहचानना, डिजिटल बैंकिंग व UPI फ्रॉड रोकना, ग्राहकों की जानकारी सुरक्षित रखना, पासवर्ड और सिस्टम सिक्योरिटी, फ्रॉड की पहचान व रिपोर्टिंग की प्रक्रिया, और सोशल इंजीनियरिंग यानी झांसा देकर जानकारी निकलवाने के तरीकों को पहचानना, साथ ही नियामक अनुपालन (रेगुलेटरी कंप्लायंस) से जुड़े दिशा-निर्देश। कोर्स में केस-स्टडी और व्यावहारिक डेमो भी शामिल होंगे, ताकि प्रतिभागी असल ज़िंदगी में सामने आने वाली धोखाधड़ी की स्थितियों को पहचानना सीख सकें। रहने-खाने की व्यवस्था NCCE के साईंधाम गेस्ट हाउस में 8 से 11 सितंबर तक रहेगी (चेक-आउट 12 सितंबर दोपहर तक), जबकि दिल्ली आने-जाने का खर्च प्रतिभागी या उनकी संस्था को खुद उठाना होगा। फीस ₹10,000 प्लस GST यानी कुल ₹11,800 प्रति प्रतिभागी रखी गई है, जो ऑनलाइन SBI के खाते में जमा करनी है। नामांकन के लिए तय फॉर्म भरकर nccend@yahoo.co.in पर ईमेल या डाक से भेजा जा सकता है, और इसकी आखिरी तारीख 31 अगस्त 2026 है। जानकारी के लिए कोर्स कोऑर्डिनेटर इंदरप्रीत कौर से मोबाइल नंबर 8800833523 पर संपर्क किया जा सकता है।
सिर्फ बड़े बैंकों के लिए नहीं, यह NCUI साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण हर सहकारी संस्था के लिए क्यों ज़रूरी
अब सवाल यह उठता है कि यह ट्रेनिंग सिर्फ शहरी सहकारी बैंकों तक सीमित क्यों रहनी चाहिए? असलियत यह है कि आज देश की हर सहकारी समिति — चाहे वह प्राथमिक कृषि साख समिति (PACS) हो, डेयरी सहकारी हो या कोई छोटी उपभोक्ता सोसाइटी — किसी-न-किसी रूप में डिजिटल लेनदेन, ऑनलाइन रिकॉर्ड-कीपिंग और UPI-आधारित भुगतान पर निर्भर हो चुकी है। सरकार खुद PACS को कंप्यूटरीकृत करने और उन्हें बैंकिंग सेवाओं से जोड़ने के अभियान में जुटी है। लेकिन जिस रफ्तार से डिजिटल पहुंच बढ़ रही है, उसी रफ्तार से साइबर सुरक्षा की समझ नहीं बढ़ रही। बड़े शहरी सहकारी बैंकों के पास फिर भी IT विभाग और कुछ हद तक तकनीकी संसाधन होते हैं, जबकि ज़्यादातर छोटी सोसाइटी में एक ही कर्मचारी हिसाब-किताब, ग्राहक सेवा और अब डिजिटल लेनदेन — तीनों काम संभालता है। LocalCircles के सर्वे में जो आंकड़ा सबसे ज़्यादा ध्यान खींचता है, वह यह है कि ज़्यादातर फ्रॉड तकनीकी सेंध से नहीं, बल्कि इंसानी भरोसे का फायदा उठाकर होते हैं — फर्जी कॉल, फर्जी लिंक, या OTP मांगने वाला कोई “बैंक अधिकारी”। यानी सबसे मजबूत डिफेंस कोई महंगा सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि वह कर्मचारी है जो फोन पर बैठकर संदिग्ध कॉल को पहचान सके। इसी वजह से इस तरह की ट्रेनिंग का दायरा सिर्फ बैंकों तक नहीं, बल्कि हर उस सहकारी संस्था तक पहुंचना चाहिए जो पैसे या सदस्यों का डेटा संभालती है। तकनीकी सहयोग के मोर्चे पर हो रहे प्रयासों की एक और मिसाल NUCFDC के “Bank in a Box” मॉडल पर हमारी रिपोर्ट में पढ़ें, जो छोटे शहरी सहकारी बैंकों को बड़ी बैंकों जैसी साइबर सुरक्षा तकनीक देने की कोशिश है।
कोर्स की सीमाएं भी समझनी ज़रूरी
निष्पक्ष नज़रिए से देखें तो इस पहल की कुछ सीमाएं भी साफ दिखती हैं। ₹11,800 की फीस, आने-जाने का खुद का खर्च और सीमित सीटें — यह सब मिलाकर छोटी और आर्थिक रूप से कमज़ोर सोसाइटी के लिए इस कोर्स तक पहुंचना आसान नहीं। तीन दिन की ट्रेनिंग से केवल कुछ ही संस्थाओं के चुनिंदा कर्मचारी प्रशिक्षित हो पाएंगे, जबकि देश में लाखों सहकारी समितियां काम कर रही हैं। इसके अलावा, जैसा कि सहकारी बैंकों में हुए घोटालों के विश्लेषण से साफ है, सिर्फ साइबर जागरूकता से रेगुलेटरी बंटवारे (RBI बनाम राज्य रजिस्ट्रार) जैसी ढांचागत खामियां दूर नहीं होंगी। बड़े स्तर के फ्रॉड — जैसे न्यू इंडिया या PMC बैंक के मामले — इंटरनल गवर्नेंस और मैनेजमेंट की चूक से जुड़े थे, न कि सिर्फ कर्मचारियों की साइबर-जागरूकता की कमी से। फिर भी, यह मानना गलत होगा कि इसीलिए ऐसी ट्रेनिंग बेकार है। हर बड़ा बदलाव छोटे कदमों से शुरू होता है, और फ्रंटलाइन स्टाफ को फिशिंग, UPI फ्रॉड और सोशल इंजीनियरिंग पहचानना सिखाना — भले ही वह पूरी समस्या का हल न हो — रोज़मर्रा के उन छोटे-छोटे फ्रॉड को ज़रूर रोक सकता है, जिनसे आम जमाकर्ता और सदस्य सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं।
आगे क्या करें
जो सहकारी संस्थाएं इस NCUI साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण में अपने कर्मचारियों को भेजना चाहती हैं, उनके लिए नामांकन की आखिरी तारीख 31 अगस्त 2026 है — यानी बेहद कम समय बचा है। इच्छुक संस्थाएं तुरंत NCCE से nccend@yahoo.co.in पर या इंदरप्रीत कौर (8800833523) से संपर्क कर सकती हैं। और जो लोग इस कोर्स में शामिल नहीं भी हो पा रहे, उनके लिए भी यह याद रखने लायक है कि किसी भी संदिग्ध लेनदेन या साइबर धोखाधड़ी की सूचना नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर तुरंत दर्ज कराई जा सकती है — जितनी जल्दी शिकायत होगी, पैसा वापस मिलने की संभावना उतनी ही ज़्यादा रहती है। आखिरकार, सहकारी आंदोलन की बुनियाद ही सदस्यों के आपसी भरोसे पर टिकी है। जिस दिन वह भरोसा किसी घोटाले या साइबर फ्रॉड में टूटता है, उसका असर सिर्फ एक बैंक या एक सोसाइटी तक सीमित नहीं रहता — पूरे सहकारी ढांचे की साख पर सवाल उठने लगते हैं। इसी वजह से यह NCUI साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण, अपनी सीमाओं के बावजूद, हर सहकारी संस्था के ध्यान देने लायक है।
स्रोत सूची (Source List)
- NCUI/NCCE आधिकारिक पत्र, “साइबर सिक्योरिटी एंड फ्रॉड प्रिवेंशन ट्रेनिंग प्रोग्राम” (Ref: NCCE/CCLP/ND.2026/27, दिनांक 04.08.2026) — ncui.coop
- NCUI — National Centre for Cooperative Education (NCCE)
- NCUI — About NCUI
- RBI — Basic Cyber Security Framework for Primary (Urban) Cooperative Banks (UCBs)
- Indian Cooperative — RBI sets ambitious 2026-27 Supervisory Agenda for UCBs
- Indian Cooperative — RBI for Rs 25K Cyber Fraud Relief for Co-op Bank Customers
- The420.in — The ₹122 Crore Question: How India’s Co-op Banks Became Scam Factories
- Business Standard — 1 in 5 UPI users faced fraud; 51% victims didn’t report (LocalCircles survey)
- Insights on India — Cybercrime in India 2025: 24% Spike, ₹22,495 Crore Lost (MHA data)
- राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल — cybercrime.gov.in / हेल्पलाइन 1930
संबंधित लेख
- किताबों से निकलकर प्लांट तक पहुंची सहकारिता शिक्षा: NCUI ने विद्यार्थियों को Mother Dairy के कामकाज से कराया परिचित
- हरियाणा के सहकारी बैंकों में खाली पद 90% तक: विधानसभा के जवाब में सामने आई पूरी तस्वीर











