सितंबर 2023 में HAFED (हरियाणा राज्य सहकारी आपूर्ति एवं विपणन संघ) ने अपने सभी District Managers, Processing Units, Rice Mills, Cold Storage और Regional Sales Offices को एक आंतरिक सर्कुलर (No. Hafed/Acctt/Tax/2850, दिनांक 14.09.2023) जारी किया था, जिसका विषय था — “Regarding Non-applicability of TDS u/s 194Q of the Income Tax Act, 1961 on the purchase made by Hafed through Member Cooperative Societies”। यह सर्कुलर, इसके साथ संलग्न एक Undertaking फॉर्म, और 18 मई 2023 की एक बैठक के मिनट्स — तीनों दस्तावेज़ मिलकर हरियाणा की Cooperative Marketing Societies (CMS) पर लगने वाले TDS को लेकर एक लंबे विवाद की कहानी बताते हैं। इस लेख में हम इस पूरे मामले को — कानूनी आधार, संख्याओं, प्रभावित पक्षों और वर्तमान स्थिति के साथ — विस्तार से समझेंगे।
दस्तावेज़ में क्या है? — तीन हिस्सों का सार
यह पूरा सेट तीन जुड़े हुए दस्तावेज़ों से बना है:
- सर्कुलर (14.09.2023) — General Manager (F&A), for Managing Director, HAFED द्वारा हस्ताक्षरित। इसमें बताया गया कि हरियाणा कोऑपरेटिव मार्केटिंग सोसाइटी एम्प्लॉइज़ यूनियन (The Haryana Cooperative Marketing Society Employees Union) की मांग पर विचार करने के बाद प्राधिकरण (authority) ने तय किया कि अब CMS कृषि उपज की “sale invoice” नहीं बनाएंगी, बल्कि केवल अपनी सेवा के बदले “commission invoice” बनाएंगी। यह बदलाव KMS (Kharif Marketing Season) 2023-24 से लागू माना गया, बशर्ते इसके लिए सभी सदस्य समितियों की लिखित सहमति (consent) मिले।
- Undertaking (सहमति-पत्र) — हर सदस्य समिति के अध्यक्ष (Chairman) को यह फॉर्म भरकर देना था, जिसमें समिति यह स्वीकार करती है कि उसने नई प्रक्रिया के फ़ायदे-नुकसान समझ लिए हैं, और वह HAFED को इस प्रक्रिया से होने वाले किसी भी नुकसान से indemnify (क्षतिपूर्ति से मुक्त) करेगी — यानी समिति भविष्य में इस वजह से कोई मौद्रिक या गैर-मौद्रिक मुआवज़ा, सीधे या मुकदमे के ज़रिए, नहीं मांगेगी।
- मीटिंग मिनट्स (18.05.2023) — HAFED के CGM की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में GM(F&A), GM(Procurement), DGM(F&A), DGM(Procurement), HAFED के CA सलाहकार, Income Tax सलाहकार, और CMS यूनियन के टैक्स सलाहकार/CA व State General Secretary शामिल हुए। यहीं इस समस्या की जड़ और समाधान का प्रस्ताव चर्चा में आया।
मूल दस्तावेज़ डाउनलोड करें
नीचे वही मूल HAFED सर्कुलर (सर्कुलर + Undertaking फॉर्म + 18.05.2023 की मीटिंग मिनट्स, कुल 4 पृष्ठ) डाउनलोड के लिए उपलब्ध है, जिस पर यह पूरा लेख आधारित है।
Section 194Q क्या है और यह विवाद क्यों खड़ा हुआ?
Section 194Q, आयकर अधिनियम 1961 में Finance Act 2021 के ज़रिए जोड़ी गई एक धारा है, जो 1 जुलाई 2021 से प्रभावी हुई। इसके तहत, अगर कोई खरीदार (buyer) — जिसका पिछले वित्त वर्ष का टर्नओवर ₹10 करोड़ से अधिक है — किसी एक विक्रेता (seller) से वित्त वर्ष में ₹50 लाख से अधिक का माल खरीदता है, तो उसे ₹50 लाख से ऊपर की राशि पर 0.1% TDS काटकर सरकार को जमा करना होता है (विक्रेता का PAN न होने पर यह दर 5% तक बढ़ जाती है)। HAFED, जो हरियाणा में गेहूं, सरसों, धान जैसी फसलों की सरकारी खरीद (MSP procurement) का प्रमुख संस्थान है, इस थ्रेशोल्ड से कहीं ऊपर का कारोबार करता है — इसलिए यह धारा उस पर लागू होती है।
समस्या यहां से शुरू होती है: HAFED सीधे किसान से खरीद नहीं करता, बल्कि हरियाणा भर की सैकड़ों Cooperative Marketing Societies (CMS) — जैसे रानियां (सिरसा) की Rania Cooperative Marketing-cum-Processing Society — किसानों से उपज खरीदकर HAFED के लिए इकट्ठा करती हैं और बदले में एक तय कमीशन पाती हैं। मौजूदा (2023 तक की) प्रचलित व्यवस्था में, HAFED अपनी खरीद CMS द्वारा जमा किए गए बिलों के आधार पर बुक करता था — यानी कागज़ पर ऐसा दिखता था मानो HAFED, CMS से माल खरीद रहा हो, न कि किसान से। इसी वजह से HAFED, CMS को दी जाने वाली पूरी खरीद-राशि पर Section 194Q के तहत TDS काट रहा था — मानो CMS ही “विक्रेता” हो।
“डबल TDS” की असली समस्या — संख्याओं में समझें
मीटिंग मिनट्स में CMS यूनियन ने जो आंकड़े रखे, वे समस्या की गंभीरता स्पष्ट करते हैं। गेहूं खरीद में CMS को मिलने वाला कमीशन उस समय केवल ₹1.33 प्रति क्विंटल था, जबकि गेहूं की MSP खरीद-राशि लगभग ₹2,170 प्रति क्विंटल थी। अब HAFED दो जगह TDS काट रहा था:
| टैक्स धारा | किस राशि पर | तत्कालीन दर (2023) | प्रति क्विंटल असर (लगभग) |
|---|---|---|---|
| Section 194Q | पूरी खरीद-राशि (₹2,170/क्विंटल) | 0.1% | ≈ ₹2.17 |
| Section 194H | केवल कमीशन (₹1.33/क्विंटल) | 5% | ≈ ₹0.07 |
मिनट्स के अनुसार, इन दोनों कटौतियों का कुल असर मिलाकर लगभग ₹0.91 प्रति क्विंटल की शुद्ध वसूली (net recovery) CMS से हो रही थी — जबकि CMS की कुल कमाई ही ₹1.33 प्रति क्विंटल थी। यानी कमीशन का करीब दो-तिहाई हिस्सा सिर्फ TDS में ही चला जा रहा था (हालांकि TDS अंततः वार्षिक रिटर्न में एडजस्ट/रिफंड होने योग्य होता है, पर तुरंत का नकदी-प्रवाह/cash-flow असर भारी था)। यही वजह थी कि मिनट्स में साफ लिखा गया — “due to this, all CMS are facing great difficulties in their operations.”
CMS यूनियन का तर्क क्या था — कानूनी आधार
CMS यूनियन और उनके वकील/CA ने बैठक में जो तर्क रखा, वह भारतीय टैक्स कानून में पहले से मौजूद एक स्थापित सिद्धांत — “कच्चा आढ़ती” (Kachha Arahtia) की अवधारणा — पर आधारित था। CBDT के पुराने Circular No. 452 (1986) के अनुसार, एक कच्चा आढ़ती (या कमीशन एजेंट) कभी भी माल का मालिक नहीं होता — वह सिर्फ किसान (अपने “constituent”) की ओर से माल बेचने में सहायता करता है, और बदले में केवल कमीशन कमाता है। ऐसे एजेंट का “टर्नओवर” उसकी संभाली गई कुल बिक्री-राशि नहीं, बल्कि केवल उसका कमीशन माना जाता है। यही तर्क CMS पर भी लागू होता है — यूनियन का कहना था कि CMS सिर्फ किसानों/जमींदारों की ओर से HAFED के एजेंट के रूप में काम करती हैं, वास्तविक विक्रेता किसान ही हैं, इसलिए CMS पर पूरी खरीद-राशि पर 194Q की जगह केवल कमीशन पर 194H लगना चाहिए।
यह तर्क HAFED की अपनी प्रक्रिया से भी मेल खाता था — मीटिंग मिनट्स में उल्लेख है कि किसानों को भुगतान वैसे भी सरकारी निर्देशों के अनुसार सीधे उनके बैंक खाते में E-Kharid पोर्टल (हरियाणा सरकार का डिजिटल खरीद पोर्टल) के ज़रिए किया जाता है, CMS के हाथ से होकर नहीं गुज़रता। इसलिए तार्किक रूप से भी माल की असली खरीद किसान से सीधे HAFED द्वारा होती दिखनी चाहिए, न कि CMS से। समाधान के तौर पर तय हुआ कि CMS अब सिर्फ अपनी सेवा का commission invoice जारी करेगी, कोई sale invoice नहीं — और HAFED अपनी खरीद बुक करने के लिए e-kharid लेन-देन, MIS रिपोर्ट, तथा I-Form/J-Form (मंडी खरीद के मानक दस्तावेज़) को सहायक प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल करेगा।
यह किन-किन को प्रभावित करता है?
- Cooperative Marketing Societies (CMS) — सबसे सीधा असर। सही लागू होने पर उनकी पहले से पतली कमीशन-आय पर लगने वाला भारी TDS बोझ घटता है, नकदी-प्रवाह बेहतर होता है। लेकिन बदले में हर समिति को Undertaking पर हस्ताक्षर कर HAFED को हर तरह के भावी नुकसान से indemnify करना पड़ता है — यानी अगर कल को Income Tax विभाग इस व्यवस्था को गलत मानकर HAFED पर पेनल्टी लगाए, तो समितियां कोई मुआवज़ा नहीं मांग सकतीं। यह एक तरह से जोखिम CMS पर स्थानांतरित (transfer) करने जैसा भी है।
- HAFED — अनुपालन (compliance) सरल होता है, नकद-प्रवाह प्रबंधन आसान होता है, और यूनियन के साथ टकराव कम होता है। लेकिन चूंकि इस पर कोई विशिष्ट CBDT परिपत्र/स्पष्टीकरण मौजूद नहीं है (सामान्य Circular 13/2021 में commission agent के मामले पर सीधा उल्लेख नहीं मिलता), HAFED के लिए यह एक व्याख्या-आधारित (interpretation-based) निर्णय है — इसीलिए Undertaking के ज़रिए जोखिम को सीमित करने की कोशिश की गई।
- किसान (Farmers) — प्रत्यक्ष असर नगण्य है, क्योंकि भुगतान पहले से ही E-Kharid के ज़रिए सीधे उनके खाते में जाता है। यह बदलाव सिर्फ HAFED-CMS के बीच के हिसाब-किताब और टैक्स दस्तावेज़ीकरण से जुड़ा है।
- आयकर विभाग / सरकार का राजस्व — कुल टैक्स देनदारी पर कोई असर नहीं पड़ता (TDS सिर्फ अग्रिम वसूली/collection at source का तरीका है, अंतिम टैक्स दायित्व वार्षिक रिटर्न से तय होता है), लेकिन अग्रिम में जमा होने वाली TDS राशि काफी घट जाती है, क्योंकि अब बड़ी खरीद-राशि की जगह छोटी कमीशन-राशि पर ही कटौती होगी।
किसके हित में, किसे जोखिम?
साफ तौर पर यह निर्णय CMS यूनियन की मांग पर, CMS के आर्थिक हित में लिया गया — उनकी बरसों से चली आ रही शिकायत को मान्यता मिली। लेकिन “नुकसान” वाला पहलू ज़्यादा सूक्ष्म है: किसी को सीधे आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि जोखिम का पुनर्वितरण (risk redistribution) हुआ है। अगर भविष्य में Income Tax विभाग इस व्याख्या को चुनौती देता है — यानी यह कहे कि CMS वास्तव में “पक्का आढ़ती” जैसा व्यवहार करती हैं (माल पर उनका नियंत्रण था, वे सिर्फ एजेंट नहीं थीं) — तो HAFED पर Section 40(a)(ia) के तहत खर्च की अस्वीकृति (disallowance) या Section 271C के तहत TDS न काटने की पेनल्टी का जोखिम बन सकता है। ठीक यही जोखिम कम करने के लिए Undertaking में CMS से यह लिखवाया गया कि ऐसी स्थिति में वे कोई क्षतिपूर्ति नहीं मांगेंगी। दूसरे शब्दों में, फ़ायदा तुरंत CMS को मिला, पर भविष्य का कानूनी जोखिम भी काफी हद तक उन्हीं पर डाल दिया गया।
यह भी उल्लेखनीय है कि “कच्चा आढ़ती बनाम पक्का आढ़ती” की यह बहस कोई हरियाणा-विशिष्ट या HAFED-विशिष्ट मसला नहीं है — यह पूरे देश की मंडी-व्यवस्था में एक बार-बार उठने वाला वास्तविक कानूनी विवाद है। दिसंबर 2024 में Income Tax Appellate Tribunal के सामने आए एक मामले — Vikas Mehta, New Anaj Mandi, Rania बनाम Deputy Director of Income Tax — में ठीक यही उलझन सामने आई: रानियां (सिरसा) के एक कच्चे आढ़ती को एक खरीदार कंपनी ने Section 194H (कमीशन) की जगह गलती से Section 194Q के तहत TDS काट दिया, जिससे आढ़ती के TDS क्रेडिट का दावा उलझ गया। ट्रिब्यूनल ने मामला दोबारा जांच के लिए वापस भेजा। यह मामला दिखाता है कि HAFED-CMS विवाद जिस बुनियादी क़ानूनी अनिश्चितता से जन्मा, वह आज भी — 2026 में भी — मंडियों में असली, अनसुलझा मुद्दा बना हुआ है।
क्या समितियों ने इस पर कोई आंदोलन किया?
उपलब्ध दस्तावेज़ों और सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट करना ज़रूरी है: 2023 के इस सर्कुलर के मूल में सड़क-स्तर का कोई हड़ताल/धरना नहीं, बल्कि Haryana Cooperative Marketing Society Employees Union द्वारा औपचारिक मांग (demand) और उसके बाद बातचीत (18 मई 2023 की बैठक) थी — यानी यह मामला बातचीत और प्रशासनिक निर्णय से सुलझा, न कि सार्वजनिक आंदोलन से। इस विशिष्ट 194Q मुद्दे पर किसी अलग स्टेट-वाइड हड़ताल की पुष्ट रिपोर्ट नहीं मिलती।
हालांकि, इसी अंतर्निहित समस्या — CMS की पतली कमीशन-आय — को लेकर 2025 में सिरसा क्षेत्र में वास्तविक विरोध-प्रदर्शन दर्ज हुए, जो सीधे 194Q के बारे में नहीं थे, पर उसी आर्थिक दबाव की अगली कड़ी माने जा सकते हैं। 29 सितंबर 2025 को HAFED के प्रबंध निदेशक के एक आदेश से धान (paddy) की खरीद पर मिलने वाला कमीशन ₹5.80 प्रति क्विंटल से घटाकर ₹1.33 प्रति क्विंटल कर दिया गया — यानी गेहूं वाली दर के बराबर। इसके विरोध में 8 अक्टूबर 2025 को सिरसा कोऑपरेटिव मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग सोसाइटी और 10-11 अक्टूबर 2025 को रानियां कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी ने अलग-अलग ज्ञापन (memorandum) सौंपे और राज्यव्यापी हड़ताल की चेतावनी दी। मांगें थीं: धान कमीशन पुरानी दर पर बहाल हो, गेहूं कमीशन को MSP के 0.25% पर तय किया जाए (न कि फ्लैट रेट पर), आंगनवाड़ी आपूर्ति का ढुलाई-भाड़ा ₹70 से बढ़ाकर ₹150/क्विंटल हो, और उर्वरक आपूर्ति कोटा 40% से 60% किया जाए। इन खबरों में TDS/194Q का सीधा ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट दिखाता है कि CMS की आय पहले से ही इतनी कम है कि कोई भी कटौती — चाहे कमीशन-दर में सीधी कमी हो या टैक्स के ज़रिए अप्रत्यक्ष कमी — समितियों को तुरंत आंदोलन की स्थिति में ला देती है।
अब (2026 में) स्थिति क्या है?
2023 के बाद से टैक्स कानून में दो बड़े बदलाव हुए हैं, जो इस पूरे हिसाब को प्रभावित करते हैं:
- Section 194H की दर घटी — बजट 2024 में हुए बदलाव के अनुसार 1 अक्टूबर 2024 से कमीशन/ब्रोकरेज पर TDS दर 5% से घटाकर 2% कर दी गई। यानी अगर CMS अब भी अपनी कमीशन-आय पर TDS भरती हैं, तो उस पर बोझ 2023 की तुलना में कम हो गया है।
- Section 194Q अब Section 393(1) बन गई है — भारत सरकार के नए Income-tax Act, 2025 ने पुराने 1961 के अधिनियम की जगह ली है, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हुआ। पुरानी धारा 194Q (माल-खरीद पर TDS) को नई संहिता में धारा 393(1) के रूप में समेकित (consolidate) किया गया है। अधिकारी और टैक्स सलाहकार बताते हैं कि यह बदलाव मुख्यतः संरचनात्मक (structural) है — दर और थ्रेशोल्ड मूल रूप से वही बने हुए हैं, सिर्फ धारा-संख्या और प्रारूप बदला है। यानी 2023 के इस HAFED सर्कुलर में जिस “194Q” का ज़िक्र है, वह कानूनी सिद्धांत आज भी लागू है, बस अब उसे धारा 393(1) के नाम से जाना जाता है।
जहां तक इस विशेष व्यवस्था — यानी क्या सभी सदस्य समितियों ने वाकई Undertaking पर हस्ताक्षर किए और क्या commission-only invoicing की प्रक्रिया राज्यभर में पूरी तरह लागू हो चुकी है — इसकी कोई स्वतंत्र, सार्वजनिक रूप से पुष्ट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं मिली। यह जानकारी केवल HAFED के आंतरिक रिकॉर्ड या संबंधित समितियों के पास ही होगी। इसलिए इस बिंदु पर तथ्य को अनुमान से भरने के बजाय यह स्पष्ट रूप से एक खुला प्रश्न (unconfirmed) के रूप में दर्ज किया जा रहा है। वहीं 2025 के कमीशन-कटौती विरोध यह ज़रूर बताते हैं कि CMS की आर्थिक स्थिति और HAFED के साथ उनका संबंध आज भी तनावपूर्ण और सक्रिय बहस का विषय बना हुआ है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, यह 2023 का HAFED सर्कुलर एक तकनीकी लगने वाले टैक्स-अनुपालन मुद्दे — Section 194Q बनाम 194H — के पीछे छिपी एक बहुत वास्तविक आर्थिक समस्या को उजागर करता है: हरियाणा की सहकारी विपणन समितियां, जो किसान और HAFED के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी हैं, बेहद पतले कमीशन पर काम करती हैं, और टैक्स प्रणाली की एक तकनीकी खामी (यानी उन्हें “विक्रेता” मान लेना, जबकि वे सिर्फ “एजेंट” हैं) उनकी पहले से कम आय को और घटा सकती है। HAFED ने इसे बातचीत और कानूनी व्याख्या से सुलझाने की कोशिश की, लेकिन जोखिम का बड़ा हिस्सा Undertaking के ज़रिए समितियों पर ही छोड़ दिया। और जैसा 2025 के विरोध-प्रदर्शन दिखाते हैं, CMS का मूल आर्थिक संघर्ष — पर्याप्त कमीशन न मिलना — आज भी जारी है, चाहे कारण टैक्स हो या सीधे कमीशन-दर में कटौती।
यह लेख शुद्ध रूप से सूचनात्मक और शोध-आधारित है, कोई टैक्स/कानूनी सलाह नहीं। HAFED के आंतरिक सर्कुलर/मीटिंग-मिनट्स की सामग्री उपलब्ध स्कैन दस्तावेज़ पर आधारित है। यदि आप किसी CMS से जुड़े हैं और अपने विशिष्ट मामले में 194Q/393(1) या 194H की प्रयोज्यता जानना चाहते हैं, तो कृपया किसी योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट या टैक्स सलाहकार से परामर्श करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Section 194Q और Section 194H में मूल अंतर क्या है?
194Q किसी वस्तु की खरीद-राशि पर लगता है (खरीदार द्वारा काटा जाता है), जबकि 194H किसी कमीशन/ब्रोकरेज भुगतान पर लगता है। असली सवाल यह है कि CMS को “विक्रेता” माना जाए (तब 194Q) या सिर्फ “एजेंट” (तब सिर्फ कमीशन पर 194H) — यही इस पूरे विवाद की जड़ है।
क्या इस बदलाव से किसानों को मिलने वाली MSP राशि में कोई अंतर आता है?
नहीं। किसान को भुगतान वैसे भी E-Kharid पोर्टल के ज़रिए सीधे होता है और उस राशि पर कोई TDS नहीं कटता। यह पूरा मामला सिर्फ HAFED और CMS के बीच के हिसाब-किताब और टैक्स दस्तावेज़ीकरण से जुड़ा है।
क्या यह निर्णय किसी CBDT परिपत्र पर आधारित है?
सीधे तौर पर नहीं। Section 194Q पर मुख्य मार्गदर्शक दस्तावेज़ CBDT Circular No. 13/2021 है, जिसमें कमीशन एजेंट/APMC लेन-देन का विशेष उल्लेख नहीं है। HAFED का निर्णय एक पुराने, सामान्य सिद्धांत — कच्चा आढ़ती संबंधी CBDT Circular No. 452 (1986) — की व्याख्या पर आधारित प्रतीत होता है, इसीलिए जोखिम कम करने हेतु Undertaking ली गई।
क्या यह सिर्फ हरियाणा/HAFED तक सीमित मुद्दा है?
नहीं। “कच्चा आढ़ती बनाम पक्का आढ़ती” और 194Q की प्रयोज्यता का सवाल देश भर की मंडियों में कमीशन एजेंटों को प्रभावित करता है, जैसा दिसंबर 2024 के रानियां (सिरसा) से जुड़े ITAT मामले में भी देखा गया।
अब (2026 में) कौन-सी धारा लागू होगी — 194Q या 393(1)?
1 अप्रैल 2026 से हुए लेन-देन पर नए Income-tax Act, 2025 की Section 393(1) लागू होती है, जो पुरानी 194Q का ही समेकित रूप है (मूल दर/थ्रेशोल्ड में कोई बड़ा बदलाव नहीं)। इससे पहले के लेन-देन (जैसे यह 2023 का मामला) पुराने अधिनियम की Section 194Q के तहत ही आते हैं।
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स्रोत एवं संदर्भ
प्राथमिक स्रोत:
- HAFED सर्कुलर No. Hafed/Acctt/Tax/2850, दिनांक 14.09.2023 (उपयोगकर्ता द्वारा साझा किया गया स्कैन दस्तावेज़, Undertaking व 18.05.2023 की मीटिंग मिनट्स सहित)
द्वितीयक/सहायक स्रोत:
- ClearTax — Section 194Q: Applicability, TDS Rate, Turnover Limit
- IndiaFilings — Section 194H TDS Rate Reduction (2% from Oct 2024)
- India Briefing — Section 393 of Income Tax Act 2025 (नई संहिता, 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी)
- TaxGuru — Summary of CBDT Circular No. 13 of 2021 on Section 194Q
- TaxGuru — TDS u/s 194Q Applicability to Kachha Arahtias (CBDT Circular 452/1986)
- Indian Kanoon — Vikas Mehta, New Anaj Mandi, Rania vs DCIT (ITAT, 10 दिसंबर 2024)
- The Tribune — Sirsa co-op societies protest Hafed commission cuts (8 अक्टूबर 2025)
- The Tribune — Rania co-op protests commission reduction on paddy procurement (11 अक्टूबर 2025)
Legal review: 11 सितंबर 2026 | यह लेख सूचनात्मक उद्देश्य से है, व्यावसायिक टैक्स/कानूनी सलाह का विकल्प नहीं।











