मान लीजिए आप किसी सहकारी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के सदस्य हैं और आपने प्रबंध समिति से बैलेंस शीट, ऑडिट रिपोर्ट या किसी मीटिंग के मिनट्स मांगे। जवाब में समिति कहती है — “हम RTI एक्ट के दायरे में नहीं आते, हम कोई सरकारी संस्था नहीं हैं, हम प्राइवेट बॉडी हैं।” क्या यह जवाब कानूनी तौर पर सही है? या फिर एक ऐसा रास्ता भी है जिससे वही जानकारी आपको फिर भी मिल सकती है?
यही सवाल है जिसका जवाब सुप्रीम कोर्ट, कई हाईकोर्ट और हरियाणा स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन बार-बार दे चुके हैं — और जवाब उतना सीधा नहीं है जितना समितियां अक्सर दावा करती हैं। इस लेख में हम बिल्कुल सटीक तरीके से समझेंगे कि RTI एक्ट, 2005 की धारा 2(h) के तहत सहकारी समितियां खुद “पब्लिक अथॉरिटी” हैं या नहीं, रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ के पास किस-किस जानकारी पर हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 के तहत वैधानिक पहुंच (statutory access) है और किस पर नहीं, किस धारा के तहत, और आखिर में — कौन सूचना देने के लिए बाध्य है और कौन नहीं।
एक नजर में
- सहकारी समिति खुद RTI एक्ट की धारा 2(h) के तहत “पब्लिक अथॉरिटी” तभी है जब वह सरकार द्वारा स्वामित्व में, नियंत्रित या “पर्याप्त रूप से वित्तपोषित” (substantially financed) हो — आम PACS, हाउसिंग सोसाइटी या मार्केटिंग सोसाइटी आमतौर पर इस दायरे में नहीं आतीं
- लेकिन रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ खुद एक “पब्लिक अथॉरिटी” है — इसलिए जो जानकारी उसे कानूनन समिति से मांगने का अधिकार है, वही जानकारी कोई भी नागरिक RTI के जरिए रजिस्ट्रार से मांग सकता है
- सुप्रीम कोर्ट ने *थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक बनाम केरल राज्य* (2013) 16 SCC 82 में यही सिद्धांत तय किया — और हरियाणा स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी 2025 के दो अलग-अलग मामलों में इसी सिद्धांत को दोहराया
- हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 की धारा 95 (ऑडिट), धारा 50-51 (अभिलेख कब्जे में लेना/प्रस्तुत कराना) और धारा 34 (समिति हटाना) जैसे प्रावधान रजिस्ट्रार को समिति के दस्तावेज़ों तक व्यापक वैधानिक पहुंच देते हैं
- व्यक्तिगत सदस्य की निजी जानकारी (जैसे किसी और सदस्य का बैंक खाता विवरण) RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत तब तक सुरक्षित रहती है जब तक कि उसमें कोई बड़ा सार्वजनिक हित न जुड़ा हो
धारा 2(h): “पब्लिक अथॉरिटी” का मतलब क्या है?
RTI एक्ट, 2005 सिर्फ “पब्लिक अथॉरिटी” पर लागू होता है — यानी किसी निजी व्यक्ति या संस्था के पास आप सीधे RTI आवेदन नहीं भेज सकते। एक्ट की धारा 2(h) कहती है कि “पब्लिक अथॉरिटी” वह होगी जो —
“…संविधान द्वारा या उसके तहत, या संसद द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा, या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून द्वारा, या उपयुक्त सरकार द्वारा जारी अधिसूचना या आदेश द्वारा स्थापित या गठित की गई हो — और इसमें कोई भी ऐसी संस्था शामिल है जो सरकार के स्वामित्व में हो, नियंत्रित हो, या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी धन से पर्याप्त रूप से वित्तपोषित (substantially financed) हो।”
ध्यान दीजिए — इस परिभाषा में तीन अलग-अलग कसौटियां हैं: स्वामित्व (ownership), नियंत्रण (control) और वित्तपोषण (financing)। किसी भी एक कसौटी पर खरा उतरना काफी है, तीनों पर नहीं। लेकिन सवाल यह है कि सरकार द्वारा बनाए गए कानून (यानी हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984) के तहत रजिस्टर्ड होना — क्या इतना ही काफी है कि कोई सहकारी समिति खुद पब्लिक अथॉरिटी बन जाए? यहीं से असली बहस शुरू होती है।
सहकारी समिति खुद पब्लिक अथॉरिटी क्यों नहीं मानी जाती?
यहां सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि लोग सोचते हैं — “हम एक कानून (Cooperative Societies Act) के तहत रजिस्टर्ड हैं, इसलिए हम सरकारी संस्था जैसे ही हैं।” अदालतों ने बार-बार इस धारणा को खारिज किया है।
*अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब* (1981) 1 SCC 722 में सुप्रीम कोर्ट ने छह बिंदुओं की एक कसौटी तय की थी, जिससे यह तय होता है कि कोई संस्था सरकार का “इंस्ट्रूमेंटैलिटी” (instrumentality) है या नहीं — जैसे पूरी हिस्सेदारी सरकार की हो, लगभग सारा खर्च सरकार उठाती हो, संस्था को कोई एकाधिकार सरकार ने दिया हो, प्रबंधन पर गहरा और व्यापक (deep and pervasive) सरकारी नियंत्रण हो, संस्था का काम सरकारी कामकाज जैसा ही सार्वजनिक महत्व का हो। ज्यादातर सहकारी समितियां — चाहे वह PACS हो, हाउस बिल्डिंग सोसाइटी हो या मार्केटिंग सोसाइटी — इनमें से किसी भी कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरतीं, क्योंकि उनका प्रबंधन सदस्यों की चुनी हुई समिति करती है, सरकार नहीं।
इसके बाद *स्टेट ऑफ मैसूर बनाम अलुम करीबसप्पा* (1974) 2 SCC 498 में कोर्ट ने साफ किया कि “नियंत्रण” (control) का मतलब सिर्फ कानून के तहत निगरानी या सुपरविजन नहीं, बल्कि प्रबंधन और कामकाज पर “पर्याप्त नियंत्रण” (substantial control) होना चाहिए। रजिस्ट्रार का ऑडिट करवाना, बाय-लॉज़ मंजूर करना या चुनाव करवाना — यह सब रेगुलेटरी सुपरविजन है, न कि प्रबंधन में सीधा दखल।
और सबसे अहम फैसला — *थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य* (2013) 16 SCC 82 — में सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि केरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ एक्ट के तहत रजिस्टर्ड सहकारी समितियां, जो सरकार के स्वामित्व में, नियंत्रण में या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित नहीं हैं, RTI एक्ट की धारा 2(h) के दायरे में नहीं आतीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि “पर्याप्त वित्तपोषण” साबित करने का बोझ (burden of proof) RTI आवेदक पर होता है — उसे यह दिखाना होगा कि सरकारी सहायता के बिना संस्था का चलना ही मुश्किल हो जाएगा। सिर्फ कुछ सब्सिडी या अनुदान मिलना काफी नहीं।
लेकिन एक दरवाज़ा जरूर खुला रहता है — रजिस्ट्रार वाला रास्ता
यहीं पर ज्यादातर लोग गलती कर बैठते हैं — वे मान लेते हैं कि अगर समिति पब्लिक अथॉरिटी नहीं है, तो उससे जुड़ी कोई भी जानकारी RTI से कभी नहीं मिल सकती। यह गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने *थलप्पलम* में ही यह भी साफ किया कि रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ खुद एक “पब्लिक अथॉरिटी” है, और उसे कानून के तहत जिस भी जानकारी तक पहुंचने का अधिकार है — चाहे वह जानकारी किसी समिति के पास ही क्यों न हो — वह जानकारी RTI एक्ट की धारा 2(f) के दायरे में आ जाती है।
धारा 2(f) की परिभाषा में साफ लिखा है कि “सूचना” में “किसी प्राइवेट बॉडी से जुड़ी वह जानकारी भी शामिल है, जिस तक किसी पब्लिक अथॉरिटी की पहुंच किसी अन्य कानून के तहत हो सकती है।” यानी अगर हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 रजिस्ट्रार को समिति के ऑडिट रिकॉर्ड, प्रस्ताव या अभिलेख मांगने का अधिकार देता है, तो वही जानकारी कोई भी नागरिक रजिस्ट्रार के पास RTI आवेदन देकर मांग सकता है — भले ही समिति खुद उस RTI आवेदन का सीधा जवाब देने को बाध्य न हो।
दूसरे शब्दों में कहें तो — सवाल यह नहीं कि “क्या समिति पब्लिक अथॉरिटी है?” सवाल यह है — “क्या यह जानकारी रजिस्ट्रार की कानूनी पहुंच में है?” अगर हां, तो रास्ता खुला है।
हरियाणा में यह कैसे लागू होता है: हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984
हरियाणा में सहकारी समितियों के लिए कानूनी ढांचा हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 (हरियाणा अधिनियम संख्या 22 सन् 1984) और उसके तहत बने हरियाणा सहकारी समिति नियम 1989 से चलता है। इस अधिनियम में रजिस्ट्रार को कई ऐसी वैधानिक शक्तियां दी गई हैं जो उसे लगभग हर समिति की आंतरिक कार्यप्रणाली तक पहुंच देती हैं:
- धारा 95 — ऑडिट: अधिनियम साफ कहता है कि “हर सहकारी समिति को साल में कम से कम एक बार रजिस्ट्रार द्वारा अधिकृत व्यक्ति से अपने खातों का ऑडिट करवाना होगा।” इस धारा की नौ उप-धाराओं में बैलेंस शीट, लाभ-हानि खाता, संपत्ति के मूल्यांकन और ऑडिटर की खातों-अभिलेखों तक पहुंच से जुड़े विस्तृत प्रावधान हैं — यानी हर समिति की पूरी वित्तीय तस्वीर कानूनन रजिस्ट्रार के दायरे में आती है।
- धारा 50 — अभिलेख अपने कब्जे में लेना: अगर किसी समिति के रिकॉर्ड, रजिस्टर, खाता-बही, फंड या अन्य संपत्ति के साथ छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट किए जाने की आशंका हो, तो रजिस्ट्रार उन्हें अपने कब्जे में ले सकता है।
- धारा 51 — अभिलेख प्रस्तुत कराना: जहां किताबें, रिकॉर्ड, नकदी, प्रतिभूतियां या अन्य संपत्ति संबंधित व्यक्ति को सौंपी नहीं जातीं, वहां रजिस्ट्रार उन्हें प्रस्तुत करवाने का आदेश दे सकता है।
- धारा 27 — प्रस्ताव रद्द करने की शक्ति: प्रबंध समिति द्वारा पारित किसी प्रस्ताव को रजिस्ट्रार निलंबित या रद्द कर सकता है, जिसके लिए जाहिर है उसे संबंधित मीटिंग मिनट्स और प्रस्ताव देखने का अधिकार है।
- धारा 34 — समिति हटाने की शक्ति: गंभीर गड़बड़ी की स्थिति में रजिस्ट्रार पूरी प्रबंध समिति को सुनवाई का मौका देने के बाद हटा सकता है और प्रशासक नियुक्त कर सकता है — इसके लिए भी समिति के पूरे रिकॉर्ड की जांच जरूरी होती है।
यानी अधिनियम रजिस्ट्रार को ऑडिट, अभिलेख, प्रस्ताव और गंभीर गड़बड़ी की जांच — इन चारों मोर्चों पर व्यापक वैधानिक पहुंच देता है। इस पूरे ढांचे को अदालतें और सूचना आयोग “सुपरवाइज़री या रेगुलेटरी नियंत्रण” कहते हैं — यह इतना गहरा जरूर है कि रजिस्ट्रार को जानकारी तक पहुंच मिल जाए, लेकिन इतना गहरा नहीं कि समिति खुद सरकार का हिस्सा बन जाए। यही महीन फर्क है जिस पर पूरा मामला टिका है।
एक ईमानदार नोट: अधिनियम में “जांच” (inquiry) और “निरीक्षण” (inspection) से जुड़े स्वतंत्र प्रावधान भी मौजूद हैं (आमतौर पर ऑडिट वाले अध्याय में ही), लेकिन अधिनियम के अलग-अलग संशोधित संस्करणों में इनकी सटीक धारा संख्या को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना इस लेख के शोध के दौरान संभव नहीं हो सका — इसलिए हमने यहां सिर्फ वही धाराएं उद्धृत की हैं जिनकी संख्या और शब्दावली प्राथमिक स्रोत से सीधे पुष्टि हो चुकी है।
किन-किन जानकारियों पर रजिस्ट्रार की वैधानिक पहुंच है?
ऊपर बताए गए प्रावधानों के आधार पर, ये जानकारियां आमतौर पर रजिस्ट्रार की वैधानिक पहुंच में मानी जाती हैं, और इसलिए RTI के जरिए रजिस्ट्रार से मांगी जा सकती हैं:
- समिति की सालाना ऑडिट रिपोर्ट, बैलेंस शीट और लाभ-हानि खाता (धारा 95)
- जनरल बॉडी मीटिंग और प्रबंध समिति की मीटिंग के मिनट्स एवं वीडियोग्राफी — जैसा पंचकूला के मामले में तय हुआ (नीचे देखें)
- बाय-लॉज़, पंजीकरण प्रमाणपत्र और उनमें हुए संशोधन
- चुनाव संबंधी रिकॉर्ड — मतदाता सूची, नतीजे, आपत्तियां (जहां रजिस्ट्रार की निगरानी में चुनाव होते हैं)
- प्रशासक नियुक्ति या समिति हटाने से जुड़े आदेश (धारा 34)
- वे शिकायतें और जांच रिपोर्ट जो रजिस्ट्रार कार्यालय के पास औपचारिक रूप से दर्ज हैं
किन पर पहुंच नहीं है — सीमाएं क्या हैं?
यह मान लेना गलत होगा कि रजिस्ट्रार के जरिए हर तरह की जानकारी मिल ही जाएगी। कानून की तीन बड़ी सीमाएं हैं:
- जो जानकारी अधिनियम में रजिस्ट्रार के अधिकार-क्षेत्र में ही नहीं है, वह नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए, समिति की आंतरिक प्रशासनिक चिट्ठियां या स्टाफ के बीच के आंतरिक ईमेल, जिन्हें कानून रजिस्ट्रार को मांगने का अधिकार नहीं देता, RTI के जरिए भी नहीं मिलेंगी — क्योंकि रजिस्ट्रार खुद उन तक वैधानिक रूप से नहीं पहुंच सकता।
- व्यक्तिगत सदस्यों की निजी जानकारी — RTI एक्ट की धारा 8(1)(j)। यह धारा कहती है कि “ऐसी व्यक्तिगत जानकारी जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध नहीं है, या जिसके खुलासे से किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित हनन होगा” — उसे तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि PIO या अपीलीय अथॉरिटी को यह संतुष्टि न हो कि बड़ा सार्वजनिक हित इसे उचित ठहराता है। यानी किसी दूसरे सदस्य का बैंक खाता नंबर, फोन नंबर या व्यक्तिगत पता — यह सामान्यतः सुरक्षित रहता है।
- “सब्स्टैंशियल फाइनेंसिंग” साबित करने का बोझ आवेदक पर है। अगर आप यह दावा कर रहे हैं कि समिति खुद पब्लिक अथॉरिटी है (सिर्फ रजिस्ट्रार के जरिए नहीं, बल्कि सीधे), तो थलप्पलम फैसले के अनुसार यह साबित करने की जिम्मेदारी आप पर है कि सरकारी सहायता के बिना संस्था चल ही नहीं सकती — यह आसान नहीं है।
कौन सूचना दे सकता है, कौन नहीं?
यह हिस्सा अक्सर सबसे ज्यादा उलझन पैदा करता है, इसलिए इसे बिल्कुल सीधे शब्दों में समझते हैं:
- सहकारी समिति स्वयं — आमतौर पर RTI एक्ट के तहत अपना जन सूचना अधिकारी (PIO) नियुक्त करने के लिए वैधानिक रूप से बाध्य नहीं है, क्योंकि वह खुद पब्लिक अथॉरिटी नहीं है। इसलिए अगर आप सीधे समिति को RTI आवेदन भेजते हैं, तो कानूनन वह “यह एक्ट हम पर लागू नहीं होता” कहकर इनकार कर सकती है — और ज्यादातर मामलों में यह इनकार तकनीकी रूप से सही भी होगा।
- रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ का कार्यालय — यह खुद एक पब्लिक अथॉरिटी है, और इसका PIO जानकारी देने के लिए बाध्य है — लेकिन सिर्फ उतनी ही, जितनी कानूनन उसकी पहुंच में है। अगर आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी समिति के पास तो है, पर रजिस्ट्रार के वैधानिक अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, तो रजिस्ट्रार भी सीधे इनकार कर सकता है — लेकिन (जैसा पंचकूला के मामले में हुआ) उसे “पहले जानकारी मांगकर तो देखनी चाहिए,” ऐसा-ऐसा कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता।
- राज्य सहकारिता विभाग/मुख्यालय स्तर के अधिकारी — जहां तक उनकी अपनी फाइलों, नीतिगत निर्णयों या परिपत्रों का सवाल है, वे सामान्य सरकारी कार्यालयों जैसी ही RTI बाध्यता में आते हैं।
तुलना: सीधे समिति से बनाम रजिस्ट्रार के जरिए
| पहलू | सीधे समिति को RTI भेजने पर | रजिस्ट्रार के जरिए RTI भेजने पर |
|---|---|---|
| क्या यह कानूनन बाध्यकारी है? | आमतौर पर नहीं — समिति पब्लिक अथॉरिटी नहीं है | हां — रजिस्ट्रार खुद पब्लिक अथॉरिटी है |
| किस पर आधारित सिद्धांत | धारा 2(h) — सीधी परिभाषा | धारा 2(f) + थलप्पलम फैसला — “जिस तक रजिस्ट्रार की पहुंच है” |
| ऑडिट रिपोर्ट/बैलेंस शीट | इनकार की पूरी संभावना | मिलने की संभावना अधिक (धारा 95 के तहत रजिस्ट्रार की पहुंच में) |
| मीटिंग मिनट्स/वीडियोग्राफी | इनकार की पूरी संभावना | मिलने की संभावना (पंचकूला केस से पुष्ट) |
| दूसरे सदस्य की निजी जानकारी | वैसे भी नहीं मिलेगी | धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित |
| अपील का रास्ता | सीमित/अस्पष्ट | स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन तक स्पष्ट अपील प्रक्रिया |
तीन असली उदाहरण जो यह सिद्धांत साबित करते हैं
1. थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक बनाम केरल राज्य (2013) 16 SCC 82 — सुप्रीम कोर्ट। केरल की सहकारी समितियों को राज्य सरकार के एक परिपत्र से RTI PIO नियुक्त करने को कहा गया था। समितियों ने इसे चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने परिपत्र रद्द करते हुए कहा कि समितियां खुद पब्लिक अथॉरिटी नहीं हैं, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि “रजिस्ट्रार अपनी सुपरवाइज़री या प्रशासनिक निगरानी के तहत समिति से जो जानकारी वैधानिक रूप से मांग सकता है, वह जानकारी वह RTI आवेदक को उपलब्ध करा सकता है” — यही वह पैराग्राफ है जो पूरे मौजूदा कानूनी ढांचे की नींव है।
2. पंचकूला की New Haryana Officers Cooperative Group Housing Society — हरियाणा SIC (जनवरी-अक्टूबर 2025)। रिटायर्ड जज कुलदीप जैन ने अपनी ही सोसाइटी से जनरल बॉडी मीटिंग की वीडियोग्राफी मांगी, जिसे इनकार किया गया। हरियाणा स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन (अध्यक्षता डॉ. अजय कुमार सुरा) ने कहा — “जब रिस्पॉन्डेंट पब्लिक अथॉरिटी को समिति से जानकारी हासिल करने का वैधानिक अधिकार है, तो सिर्फ यह कहकर इनकार नहीं किया जा सकता कि समिति खुद पब्लिक अथॉरिटी नहीं है।” रजिस्ट्रार को पूरी अनएडिटेड वीडियोग्राफी दिलाने का आदेश दिया गया। इस मामले का पूरा विश्लेषण हमारे पहले के लेख में मौजूद है — नीचे “संबंधित लेख” में लिंक देखें।
3. सरस्वती कुंज कोऑपरेटिव हाउसिंग बिल्डिंग सोसाइटी बनाम हरियाणा स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन — पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट (नवंबर 2025)। गुरुग्राम की इस सोसाइटी ने SIC के एक आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, यह दावा करते हुए कि वह एक प्राइवेट संस्था है और RTI के दायरे से बाहर है। जस्टिस कुलदीप तिवारी की बेंच ने SIC का आदेश बरकरार रखा और कहा कि रजिस्ट्रार के पास दाखिल समिति के दस्तावेज़ जनहित की दृष्टि से सुलभ जानकारी की श्रेणी में आते हैं, और रजिस्ट्रार — जो खुद वैधानिक निगरानी अधिकार रखने वाली पब्लिक अथॉरिटी है — RTI एक्ट की धारा 8 में तय छूटों के अधीन रहते हुए वह जानकारी देने के लिए बाध्य है। अदालत ने एक पुराना सिद्धांत भी दोहराया — “जो संसद से नहीं छिपाया जा सकता, वह आम नागरिक से भी नहीं छिपाया जा सकता।” ध्यान रहे कि हाउसिंग सोसाइटी के मामलों में कई बार यह भी देखना जरूरी होता है कि संबंधित संस्था हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 के तहत रजिस्टर्ड “हाउस बिल्डिंग सोसाइटी” है, या फिर हरियाणा सोसाइटी पंजीकरण एवं विनियमन अधिनियम 2012 (सामान्य सोसाइटी पंजीकरण कानून, कोऑपरेटिव एक्ट से अलग) के तहत — क्योंकि दोनों मामलों में रजिस्ट्रार अलग-अलग होता है और लागू प्रावधान भी अलग-अलग हैं।
व्यावहारिक गाइड: RTI आवेदक को क्या करना चाहिए?
- पहले सीधे समिति को औपचारिक पत्र/निवेदन के जरिए जानकारी मांगें — कई बार समिति सद्भावना में जानकारी दे भी देती है, और यह भविष्य के आवेदन में “पहले प्रयास” के प्रमाण के तौर पर भी काम आता है।
- अगर समिति इनकार करे, तो RTI आवेदन सीधे समिति को नहीं, बल्कि संबंधित जिले के रजिस्ट्रार/सहायक रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ के कार्यालय में जन सूचना अधिकारी (PIO) को भेजें।
- आवेदन में स्पष्ट रूप से लिखें कि आप कौन सी जानकारी चाहते हैं और वह जानकारी किस वैधानिक प्रावधान (जैसे धारा 95 का ऑडिट रिकॉर्ड) के तहत रजिस्ट्रार के पास उपलब्ध होनी चाहिए — इससे PIO के लिए इनकार करना कठिन हो जाता है।
- अगर 30 दिन में जवाब न मिले या इनकार किया जाए, तो पहली अपील उसी कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी के पास, और दूसरी अपील हरियाणा स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन के पास करें।
- अपील में पंचकूला और सरस्वती कुंज जैसे फैसलों का हवाला दें — यह दिखाने के लिए कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि स्थापित कानूनी सिद्धांत है।
यह लेख किनके लिए उपयोगी है?
अगर आप किसी सहकारी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी, हाउस बिल्डिंग सोसाइटी, PACS, CM-PACS या मार्केटिंग सोसाइटी के सदस्य हैं और अपनी ही समिति से पारदर्शिता चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। इसी तरह अगर आप RTI कार्यकर्ता, वकील, कानून के छात्र या शोधार्थी हैं जो सहकारी क्षेत्र में पारदर्शिता के कानूनी पहलुओं को समझना चाहते हैं, तो भी यह लेख काम आएगा। दूसरी तरफ, अगर आप किसी सहकारी समिति के पदाधिकारी या सचिव हैं, तो यह जानना भी उतना ही जरूरी है — क्योंकि “हम पब्लिक अथॉरिटी नहीं हैं” कहकर हर सवाल टालना अब उतना आसान नहीं रहा, और रजिस्ट्रार के जरिए वही जानकारी बाहर आ सकती है, जिससे बेहतर है कि समिति खुद ही पारदर्शिता बनाए रखे।
निष्कर्ष
कानून की भाषा में कहें तो — सहकारी समिति “ढाल” नहीं बन सकती, लेकिन वह खुद “निशाना” भी नहीं है। असली निशाना रजिस्ट्रार का कार्यालय है, जिसके पास अधिनियम के तहत जितनी वैधानिक पहुंच है, उतनी जानकारी हर नागरिक RTI के जरिए मांग सकता है। यह न तो समितियों के लिए पूरी तरह डरने की बात है, न ही सदस्यों के लिए हर सवाल का जवाब मिल जाने की गारंटी — बल्कि यह एक संतुलन है, जिसे समझकर ही सही रास्ता चुना जा सकता है।
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स्रोत एवं संदर्भ
प्राइमरी स्रोत:
- Right to Information Act, 2005 — पूरा कानूनी पाठ (Central Information Commission)
- थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक बनाम केरल राज्य (2013) 16 SCC 82 — पूरा फैसला
- हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 — पूरा पाठ (FAO Legal Database)
सेकेंडरी स्रोत:
- LiveLaw — “Whether Cooperative Societies Come Under The Purview Of Sec 2(h) Of RTI Act, 2005?”
- The Tribune — पंचकूला SIC आदेश की रिपोर्ट
- Outlook India — सरस्वती कुंज हाईकोर्ट फैसले का विश्लेषण












