हरियाणा की एक सहकारी समिति ने 2014 में विज्ञापन निकाला, इंटरव्यू लिए और क्लर्क-कम-सेल्समैन व चौकीदार जैसे पदों पर नियुक्तियां कीं — पूरी प्रक्रिया में किसी ने भी फर्जीवाड़े, पक्षपात या गलत उम्मीदवार चुने जाने का आरोप नहीं लगाया। फिर भी 11 साल बाद, अगस्त 2025 में, इन कर्मचारियों की नौकरी सिर्फ इसलिए छीन ली गई क्योंकि जिस बोर्ड बैठक में इनकी नियुक्ति को मंज़ूरी मिली थी, उसमें तीन ज़रूरी सरकारी अधिकारी मौजूद नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors. (2026 INSC 641) मामले में इस पूरे विवाद को पलट दिया — और एक बेहद अहम सिद्धांत तय किया: अधिकारियों की गलती की सज़ा कर्मचारियों को नहीं मिलनी चाहिए।
यह फैसला सीधे तौर पर हरियाणा की सहकारी समितियों — चाहे वह PACS हो, CM-PACS हो या मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी — में नियुक्ति और सेवा-विवादों पर असर डालता है। यह लेख इस केस के तथ्यों, कानूनी तर्क और हरियाणा की अन्य सहकारी संस्थाओं के लिए इसके व्यावहारिक मतलब को विस्तार से समझाता है।
एक नजर में
- केस: Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors., 2026 INSC 641 — सुप्रीम कोर्ट, 11 जून 2026
- बेंच: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोतिस्वर सिंह
- संस्था: थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी लिमिटेड, कुरुक्षेत्र
- मूल गड़बड़ी: 13 अगस्त 2014 की बोर्ड बैठक में नियुक्ति मंज़ूर करते वक़्त तीन अनिवार्य अधिकारी (सहायक रजिस्ट्रार, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़, DM हैफेड) मौजूद नहीं थे — Rule 3 का उल्लंघन
- नतीजा जो पहले हुआ: रजिस्ट्रार से लेकर हाईकोर्ट तक — सभी ने नियुक्तियां रद्द कर दीं
- सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदला: कहा कि विज्ञापन और इंटरव्यू में कोई गड़बड़ी नहीं थी, इसलिए सिर्फ मंज़ूरी-चरण की खामी पूरी भर्ती को रद्द करने का आधार नहीं बन सकती
- निर्देश: एक महीने में बोर्ड बैठक फिर बुलाई जाए, सही अधिकारियों की मौजूदगी में नियुक्तियों पर दोबारा विचार हो; योग्य पाए जाने पर बहाली हो, पुरानी सेवा गिनी जाए, लेकिन बीच के समय का एरियर नहीं मिलेगा
पूरा मामला: 2014 की नियुक्ति से 2026 के फैसले तक
थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी लिमिटेड, कुरुक्षेत्र ने 2014 में क्लर्क-कम-सेल्समैन और प्यून-कम-चौकीदार के कुछ पदों के लिए भर्ती निकाली। विज्ञापन सही तरीके से प्रकाशित हुआ, 21 दिन का समय दिया गया, इंटरव्यू हुए और चयन प्रक्रिया में किसी तरह की धांधली, पक्षपात या अयोग्य उम्मीदवार के चयन का कोई आरोप नहीं था। 13 अगस्त 2014 को सोसाइटी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इन नियुक्तियों को मंज़ूरी दी।
समस्या यहीं से शुरू हुई: Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules, 2003 के Rule 3 के तहत ऐसी किसी भी नियुक्ति को मंज़ूरी देने वाली बोर्ड बैठक में तीन अधिकारियों — सहायक रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसाइटीज़, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़, और डिस्ट्रिक्ट मैनेजर हैफेड — का मौजूद रहना अनिवार्य था। 13 अगस्त 2014 की बैठक में ये तीनों अधिकारी मौजूद नहीं थे।
विवाद की समयरेखा
| तारीख/चरण | क्या हुआ |
|---|---|
| 13 अगस्त 2014 | सोसाइटी के बोर्ड ने बिना तीन अनिवार्य अधिकारियों की मौजूदगी के नियुक्तियां मंज़ूर कीं |
| सदस्यों की चुनौती | कुछ सोसाइटी सदस्यों ने Haryana Co-operative Societies Act, 1984 के तहत रजिस्ट्रार के सामने नियुक्तियों को चुनौती दी |
| एडिशनल रजिस्ट्रार | Rule 3 के उल्लंघन के आधार पर नियुक्तियां रद्द कीं |
| एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (अपील) | रद्दीकरण को बरकरार रखा |
| पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट (सिंगल जज) | नियुक्तियों को शून्य (void) मानते हुए रद्दीकरण बरकरार रखा |
| हाईकोर्ट डिवीज़न बेंच | सिंगल जज के फैसले की पुष्टि की (आदेश दिनांक 29.07.2025) |
| 19 अगस्त 2025 | करीब 11 साल की सेवा के बाद कर्मचारियों की सेवा समाप्त |
| सुप्रीम कोर्ट, 11 जून 2026 | हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, मामला वापस सोसाइटी को भेजा |
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: भर्ती को तीन चरणों में देखना ज़रूरी
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्र रूप से (holistically) देखने का सिद्धांत अपनाया। कोर्ट ने भर्ती को तीन चरणों में बांटा:
- विज्ञापन चरण — वेकेंसी का सार्वजनिक नोटिस, पर्याप्त समय (यहां 21 दिन) के साथ जारी हुआ। इसमें कोई खामी नहीं पाई गई।
- चयन चरण — इंटरव्यू निष्पक्ष रूप से हुए, न फर्जीवाड़े का आरोप था, न पक्षपात का, न ही किसी अयोग्य उम्मीदवार के चयन का। इसमें भी कोई खामी नहीं पाई गई।
- अंतिम मंज़ूरी चरण — यहीं Rule 3 का उल्लंघन हुआ, क्योंकि तीन अनिवार्य अधिकारी बैठक में मौजूद नहीं थे।
कोर्ट ने साफ कहा कि हर प्रक्रियागत खामी (procedural irregularity) भर्ती को रद्द करने के लिए काफी नहीं होती। कोर्ट ने दो तरह की खामियों में फ़र्क़ किया:
- मूल/जड़ तक जाने वाली खामियां (fundamental defects) — जैसे विज्ञापन ही न निकालना, बराबरी का मौका न देना, या धोखाधड़ी। ऐसी खामियां पूरी भर्ती को अमान्य कर सकती हैं।
- सुधार योग्य खामियां (curable defects) — जैसे चयन के बाद, मंज़ूरी की प्रक्रिया में कोई पर्यवेक्षी (supervisory) चूक। ऐसी खामियां भर्ती की नींव को प्रभावित नहीं करतीं और इन्हें सुधारा जा सकता है।
कोर्ट के फैसले का वह हिस्सा जो सबसे ज़्यादा उद्धृत हो रहा है (पैराग्राफ 59 से):
“We find force in the submission made on behalf of Appellants that for the irregularity committed by the officials, the Appellants ought not be made to suffer, as no allegations had been made as regards the validity of advertisement or the manner in which interview was conducted or that any ineligible candidates were recommended/appointed.”
यानी — जब अधिकारियों की अपनी चूक की वजह से प्रक्रिया में खामी आई हो, तो उसकी सज़ा उन कर्मचारियों को नहीं मिलनी चाहिए जिन्होंने खुले और निष्पक्ष मुक़ाबले से नौकरी हासिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से यह तय किया:
- पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का 29.07.2025 का आदेश रद्द (set aside) किया गया।
- सोसाइटी को निर्देश दिया गया कि वह तीनों अनिवार्य अधिकारियों (सहायक रजिस्ट्रार, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़, DM हैफेड) की मौजूदगी में बोर्ड बैठक फिर से बुलाए।
- यह पुनर्विचार सिर्फ इस बात तक सीमित रहेगा कि क्या उम्मीदवार योग्य थे, कोई अयोग्यता तो नहीं थी, और चयन समिति की सिफारिश वैध थी या नहीं — विज्ञापन या इंटरव्यू की वैधता पर दोबारा सवाल नहीं उठाया जा सकता।
- यह प्रक्रिया एक महीने के भीतर पूरी करनी होगी।
- अगर बोर्ड दोबारा मंज़ूरी देता है, तो कर्मचारियों को बहाल किया जाएगा और उनकी पुरानी सेवा (past service) आगे के लाभों के लिए गिनी जाएगी — लेकिन जिस अवधि में वे सेवा से बाहर रहे, उसका एरियर (arrears) नहीं मिलेगा।
यह फैसला हरियाणा की अन्य सहकारी समितियों के लिए क्यों मायने रखता है
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी, PACS (Primary Agricultural Credit Society) से अलग तरह की संस्था है — इस पर Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules, 2003 लागू होते हैं, जबकि PACS पर PACS/PCCS Service Rules और उनके संशोधन लागू होते हैं। दोनों अलग-अलग दस्तावेज़ हैं, इसलिए क्लॉज़-दर-क्लॉज़ यह मान लेना ग़लत होगा कि यह फैसला PACS Service Rules पर भी वैसे ही लागू होगा।
फिर भी, इस फैसले का असली महत्व एक सामान्य सिद्धांत में है, जो Haryana Co-operative Societies Act, 1984 के तहत बनी लगभग हर सहकारी संस्था — PACS, CM-PACS, दुग्ध समिति, मार्केटिंग सोसाइटी — पर लागू होता है: सोसाइटी और सरकारी पर्यवेक्षी तंत्र (Registrar/Assistant Registrar) की प्रक्रियागत चूक, अकेले इस आधार पर, किसी निष्पक्ष तरीके से चुने गए कर्मचारी की नौकरी छीनने का आधार नहीं बन सकती — जब तक कि भर्ती की बुनियाद (विज्ञापन, समान अवसर, चयन की निष्पक्षता) पर सवाल न हो।
यह सिद्धांत हरियाणा में हाल में सामने आए कई भर्ती-विवादों से सीधे जुड़ता है — जैसे कुरुक्षेत्र के ही Kharindwa Deeg PACS में अनियमित भर्ती का मामला, जहां मंत्री ने सीधे FIR का आदेश दिया था। हालांकि वह मामला तथ्यों में अलग है (वहां भर्ती की वैधता पर ही सवाल था, सिर्फ मंज़ूरी-प्रक्रिया पर नहीं), लेकिन Gaurav Mehla फैसला यह स्पष्ट करता है कि जांच एजेंसियों और अदालतों को भी यह फ़र्क़ करना होगा कि गड़बड़ी भर्ती की जड़ में है या सिर्फ प्रशासनिक औपचारिकता में।
यह भी उतना ही अहम है कि यह मामला रजिस्ट्रार-केंद्रित विवाद-निपटान तंत्र से होकर ही गुज़रा — पहले Additional Registrar, फिर अपील में Additional Chief Secretary — जो Haryana Co-operative Societies Act, 1984 की Section 102 की उसी व्यवस्था को दिखाता है जिसकी चर्चा PACS Service Rules से जुड़े लेख में विस्तार से की गई है। साथ ही, यह भी याद रखने लायक है कि हाईकोर्ट के स्तर पर सहकारी समिति को Article 12 के तहत “State” न मानने से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं — इस विषय पर अलग विस्तृत लेख पहले से मौजूद है।
किसके लिए इसका क्या मतलब है
उम्मीदवार/कर्मचारी
अगर आपकी नियुक्ति सही विज्ञापन और निष्पक्ष इंटरव्यू के बाद हुई थी, लेकिन बाद में किसी प्रशासनिक/मंज़ूरी संबंधी खामी के आधार पर रद्द कर दी गई, तो यह फैसला आपके पक्ष में एक मज़बूत मिसाल (precedent) बनता है। यह गारंटी नहीं है, लेकिन तर्क का आधार ज़रूर है।
सोसाइटी की प्रबंध समिति/बोर्ड
Rule/Section में तय अनिवार्य अधिकारियों की मौजूदगी को हल्के में न लें — यह चूक पूरी भर्ती को कानूनी विवाद में डाल सकती है, भले ही भर्ती अपने आप में पूरी तरह निष्पक्ष क्यों न हो। बेहतर है कि हर मंज़ूरी बैठक में संबंधित नियम के तहत ज़रूरी अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए और इसका रिकॉर्ड रखा जाए।
Registrar/सहायक रजिस्ट्रार जैसे अधिकारी
यह फैसला परोक्ष रूप से यह भी कहता है कि पर्यवेक्षी तंत्र की अपनी ग़ैर-मौजूदगी या चूक के लिए कर्मचारियों को दंडित करना अदालत में टिकने वाला तर्क नहीं है — इसलिए मंज़ूरी प्रक्रिया में खुद अधिकारियों की समय पर उपस्थिति और भागीदारी उतनी ही ज़रूरी है।
अन्य लंबित भर्ती-विवाद
जिन मामलों में सिर्फ मंज़ूरी/प्रक्रियागत स्तर पर खामी का आरोप है (न कि विज्ञापन, समान अवसर या चयन की निष्पक्षता पर), वहां यह फैसला एक उपयोगी संदर्भ (reference point) बनता है — लेकिन हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है।
अभी क्या करना चाहिए
- अगर आपकी नियुक्ति किसी प्रक्रियागत खामी के आधार पर रद्द हुई है, तो पहले यह जांचें कि खामी विज्ञापन/चयन चरण में थी या सिर्फ मंज़ूरी चरण में — यही फ़र्क़ इस फैसले के लागू होने की कुंजी है।
- सोसाइटी अपने Staff Service Rules में तय अनिवार्य अधिकारियों की सूची और उनकी बोर्ड बैठकों में उपस्थिति का रिकॉर्ड ज़रूर बनाए रखे।
- यह लेख कानूनी सलाह नहीं है — किसी विशिष्ट मामले में मूल आदेश और किसी योग्य वकील की सलाह ज़रूर लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. Gaurav Mehla केस किस बारे में है? यह सुप्रीम कोर्ट का 2026 का फैसला है, जिसमें कहा गया कि सिर्फ बोर्ड बैठक में अनिवार्य अधिकारियों की गैर-मौजूदगी की वजह से — जब विज्ञापन और चयन प्रक्रिया निष्पक्ष थी — पूरी भर्ती रद्द नहीं की जा सकती।
2. क्या यह फैसला PACS पर भी लागू होता है? सीधे तौर पर यह फैसला मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी के अपने Staff Service Rules, 2003 पर आधारित है, PACS Service Rules अलग दस्तावेज़ हैं। लेकिन इसका सामान्य सिद्धांत — प्रशासनिक चूक की सज़ा कर्मचारी को नहीं — किसी भी हरियाणा कोऑपरेटिव सोसाइटी के मामले में तर्क के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है।
3. कर्मचारियों को कितने साल बाद न्याय मिला? 2014 में नियुक्ति हुई, अगस्त 2025 में सेवा समाप्त हुई, और जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी — यानी विवाद लगभग 11-12 साल चला।
4. क्या कर्मचारियों को नौकरी से बाहर रहने की अवधि का वेतन (एरियर) मिलेगा? नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर बहाली होती है, तो पुरानी सेवा आगे के लाभों के लिए गिनी जाएगी, लेकिन बीच की अवधि का एरियर नहीं मिलेगा।
5. क्या इससे नियुक्तियां अपने आप बहाल हो गईं? नहीं। कोर्ट ने बहाली नहीं की, बल्कि सोसाइटी को एक महीने में सही अधिकारियों की मौजूदगी में दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। बहाली इस पुनर्विचार के नतीजे पर निर्भर करेगी।
6. सोसाइटी अब क्या दोबारा जांच सकती है? सिर्फ उम्मीदवारों की योग्यता और चयन समिति की सिफारिश की वैधता — विज्ञापन या इंटरव्यू प्रक्रिया पर दोबारा सवाल नहीं उठाया जा सकता।
7. Rule 3 क्या कहता है? Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules, 2003 का Rule 3 कहता है कि नियुक्ति मंज़ूर करने वाली बोर्ड बैठक में सहायक रजिस्ट्रार, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ और डिस्ट्रिक्ट मैनेजर हैफेड का मौजूद रहना अनिवार्य है।
8. “fundamental defect” और “curable defect” में क्या फ़र्क़ है? Fundamental defect भर्ती की बुनियाद को प्रभावित करता है (जैसे विज्ञापन न होना, धोखाधड़ी) और पूरी भर्ती रद्द कर सकता है। Curable defect बाद के प्रशासनिक चरण की चूक है (जैसे मंज़ूरी बैठक में अधिकारी की गैर-मौजूदगी), जिसे सुधारा जा सकता है।
निष्कर्ष
Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors. सिर्फ एक कर्मचारी-नियुक्ति विवाद नहीं, बल्कि यह तय करता है कि सहकारी क्षेत्र में प्रशासनिक निगरानी की चूक और भर्ती की मूल निष्पक्षता के बीच कानूनी फ़र्क़ कैसे किया जाए। हरियाणा की सैकड़ों सहकारी समितियों — PACS से लेकर मार्केटिंग सोसाइटी तक — में जहां भर्ती से जुड़े विवाद रजिस्ट्रार-स्तर से लेकर अदालत तक पहुंचते रहते हैं, वहां यह फैसला एक स्पष्ट कसौटी देता है।
यह लेख उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड (सुप्रीम कोर्ट के मूल निर्णय सहित) और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित सामान्य जानकारी/विश्लेषण है। किसी विशेष विवाद या कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित मूल आदेश/नियम और योग्य पेशेवर सलाह देखी जानी चाहिए।
स्रोत एवं संदर्भ
प्राथमिक स्रोत (Primary):
द्वितीयक स्रोत (Secondary):
- Verdictum — Appointees Need Not Suffer On Account Of Irregularity By Officials
- LiveLaw — 2026 LiveLaw (SC) 628, Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors.
- Legal Bites — Can Recruitment Be Scrapped Due to Curable Errors in Final Appointments?
- The Indian Lawyer — Supreme Court Holds Curable Irregularity In Final Appointment Process Cannot Invalidate Entire Recruitment
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