अगर हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम, 1984 यह तय करता है कि सहकारी समितियों के लिए कानून क्या है, तो हरियाणा सहकारी समिति नियम, 1989 (Haryana Co-operative Societies Rules, 1989) यह तय करते हैं कि उस कानून को व्यवहार में कैसे लागू किया जाए — किस फॉर्म पर आवेदन होगा, कितने दिन में क्या करना है, और किस प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। यह लेख अधिनियम के “साथी दस्तावेज़” इन नियमों की पूरी संरचना को आसान हिन्दी में समझाता है।
स्पष्टीकरण: यह एक सामान्य जानकारी वाला गाइड है, कानूनी सलाह नहीं। किसी विशिष्ट मामले में हमेशा मूल नियमों की प्रति, हरियाणा सहकारिता विभाग या किसी योग्य वकील से पुष्टि करें।
अधिनियम और नियमों में फर्क क्या है?
सरल भाषा में कहें तो — अधिनियम (Act) “क्या करना है” तय करता है (जैसे: हर समिति का ऑडिट होना चाहिए), जबकि नियम (Rules) “कैसे करना है” बताते हैं (जैसे: ऑडिट किस फॉर्म पर होगा, कितनी फीस लगेगी, कितने महीने के भीतर बैलेंस शीट तैयार करनी है)। इसीलिए 1984 के अधिनियम को समझने के लिए 1989 के इन नियमों को साथ में पढ़ना जरूरी है — 5 साल बाद बनाए गए ये नियम अधिनियम के हर अध्याय के लिए व्यावहारिक प्रक्रिया देते हैं।
नियमों की पूरी संरचना — 16 अध्याय
- अध्याय I — प्रारंभिक (नियम 1-2): “सहकारी वर्ष”, “परिवार”, “अधिकतम साख सीमा” जैसी परिभाषाएं
- अध्याय II — पंजीकरण व बाय-लॉज़ (नियम 3-13): पंजीकरण के लिए न्यूनतम 5 परिवार चाहिए (नियम 4); आवेदन निर्धारित फॉर्म पर बाय-लॉज़ की प्रति के साथ जमा होता है (नियम 5); बाय-लॉज़ संशोधन के लिए आम सभा में 2/3 बहुमत चाहिए (नियम 10)
- अध्याय III — सदस्यता (नियम 14-22): दिवालिया या आपराधिक दोषी व्यक्ति सदस्य नहीं बन सकते (नियम 14); बिना रजिस्ट्रार की अनुमति एक साथ कई क्रेडिट सोसाइटी की सदस्यता नहीं ली जा सकती (नियम 15); सदस्य रजिस्टर में नाम, पता, शेयर और नॉमिनी दर्ज करना अनिवार्य (नियम 22)
- अध्याय IV — आम सभा की बैठकें (नियम 23-30): कमेटी चुनाव की प्रक्रिया “परिशिष्ट A (Appendix A)” में दी गई है (नियम 25); कमेटी सदस्यता के लिए अयोग्यताएं — जैसे साख सीमा से ज्यादा बकाया होना — नियम 27 में; हटाने की प्रक्रिया नियम 28 में
- अध्याय V — कैडर सोसाइटी (नियम 31): वित्तीय वर्ष खत्म होने के 3 महीने के भीतर वार्षिक समीक्षा, 31 दिसंबर तक रजिस्ट्रार को जमा
- अध्याय VI — विशेषाधिकार (नियम 32-35): प्रमाणित प्रतियां, सरकारी ऋण/सब्सिडी की प्रक्रिया
- अध्याय VII — लेखा व रिकॉर्ड (नियम 36): वर्ष की शुरुआत में किताबों और सिक्योरिटीज़ की सूची, CEO और कस्टोडियन द्वारा सत्यापन
- अध्याय VIII — प्रभार व बंधक (नियम 37): निर्धारित फॉर्म पर चार प्रतियों में घोषणा
- अध्याय IX — ऋण व उधार (नियम 38-42): जमा स्वीकृति की सीमा आम सभा से स्वीकृत होनी चाहिए (नियम 38); समिति अपने शेयर के विरुद्ध खुद को ऋण नहीं दे सकती (नियम 42)
- अध्याय X — उपज बिक्री प्रक्रिया (नियम 43-70): कुर्की सिर्फ सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच (नियम 45); मांग नोटिस पहले जरूरी (नियम 46); बिक्री की सार्वजनिक घोषणा गांव में ढिंढोरा पीटकर (नियम 51); सबसे ऊंची बोली पर नीलामी (नियम 52)
- अध्याय XI — संपत्ति व फंड (नियम 71-75): लाभांश अधिकतम 10% प्रति वर्ष सीमित (नियम 72); शिक्षा फंड में मुनाफे का 2% तक योगदान अनिवार्य (नियम 73)
- अध्याय XII — कमजोर समितियों का पुनर्वास (नियम 76-76B): रजिस्ट्रार 90 दिन के भीतर संपत्ति/देनदारी ट्रांसफर का निर्देश दे सकते हैं
- अध्याय XIII — ऑडिट व लेखा (नियम 77-80): वित्तीय वर्ष खत्म होने के 3 महीने के भीतर बैलेंस शीट तैयार (नियम 79); ऑडिट फीस रजिस्ट्रार-स्वीकृत दर पर (नियम 80)
- अध्याय XIV — विवाद निपटान (नियम 81-88): रजिस्ट्रार को लिखित आवेदन जरूरी (नियम 81); सुनवाई में पक्षकार व गवाह मौजूद रहते हैं (नियम 85); अवार्ड 6 महीने के भीतर, विस्तार संभव (नियम 86)
- अध्याय XV — समापन (नियम 89-101): लिक्विडेटर 1 महीने के भीतर दावों के लिए सूचना प्रकाशित करता है (नियम 89); तिमाही प्रगति रिपोर्ट (नियम 91); रिकॉर्ड 3 साल बाद नष्ट किए जा सकते हैं (नियम 101)
- अध्याय XVI — अवार्ड/डिक्री निष्पादन (नियम 102-104): रजिस्ट्रार 30 दिन के नोटिस के बाद संपत्ति बिक्री का आदेश दे सकते हैं (नियम 102); पहले चल संपत्ति, फिर अचल संपत्ति कुर्क होती है
चुनाव प्रक्रिया — Appendix A का महत्व
ध्यान देने वाली बात यह है कि कमेटी चुनाव की विस्तृत प्रक्रिया — रिटर्निंग ऑफिसर की नियुक्ति, वोटर लिस्ट, नामांकन, मतदान — मुख्य नियमों के बजाय एक अलग “परिशिष्ट A (Appendix A)” में दी गई है, जिसका सीधा संदर्भ नियम 25 में मिलता है। अधिनियम की धारा 28 (चुनाव के मूल प्रावधान) को व्यवहार में लागू करने का पूरा ढांचा यहीं से आता है।
ऑडिट और विवाद निपटान — व्यावहारिक समयसीमाएं
अधिनियम की धारा 81-95 (ऑडिट) को नियम 77-80 व्यावहारिक समयसीमा देते हैं — बैलेंस शीट वित्तीय वर्ष खत्म होने के सिर्फ 3 महीने के भीतर तैयार करनी होती है। इसी तरह अधिनियम की धारा 96-102 (विवाद व मध्यस्थता) को नियम 81-88 प्रक्रिया देते हैं — लिखित आवेदन, अग्रिम मध्यस्थता फीस, और अवार्ड के लिए अधिकतम 6 महीने की समयसीमा (विस्तार की गुंजाइश के साथ)।
यह नियम क्यों जानने चाहिए?
अक्सर सदस्य या समिति सचिव यह मान लेते हैं कि सिर्फ अधिनियम पढ़ लेना काफी है, लेकिन असल विवाद (देर से ऑडिट, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल, समय पर बैलेंस शीट न बनना) अक्सर नियमों में दी गई सटीक समयसीमा और फॉर्म को न जानने से पैदा होते हैं। इसीलिए Sahakar Watch की इस सीरीज़ में हम अधिनियम के साथ-साथ इन नियमों का भी नियमित संदर्भ देंगे।
स्रोत सूची (Source List)
- Indian Kanoon — Haryana Co-operative Societies Rules, 1989 (पूर्ण पाठ)
- RCS Haryana — Act & Rules (आधिकारिक पेज)
- India Code — Haryana Co-operative Societies Act व संबद्ध Rules
- Court Kutchehry — Haryana Cooperative Societies Rules, 1989 (केस रेफरेंस)
- Sahakar Watch — हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984: पूरी गाइड
- Sahakar Watch — धारा 28: चुनाव के नियम क्या हैं?
- Sahakar Watch — सहकारी समिति ऑडिट गाइड
- Sahakar Watch — धारा 102: सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र












