हरियाणा में हर सहकारी समिति — चाहे वह PACS हो, CM-PACS हो, दुग्ध समिति हो या हार्को बैंक जैसी बड़ी संस्था — कानूनी तौर पर एक ही मूल कानून से संचालित होती है: हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम, 1984 (Haryana Co-operative Societies Act, 1984 — हरियाणा अधिनियम संख्या 22 of 1984)। पंजीकरण से लेकर चुनाव, ऑडिट, विवाद और यहां तक कि किसी समिति को बंद करने तक — हर प्रक्रिया इसी अधिनियम के किसी न किसी अध्याय से तय होती है। यह लेख इस अधिनियम की पूरी संरचना को आसान हिन्दी में समझाता है, ताकि सदस्य, कर्मचारी और आम पाठक यह जान सकें कि कौन-सी बात किस अध्याय और धारा में दर्ज है। आगे इसी सीरीज़ में हम कुछ महत्वपूर्ण धाराओं (जैसे धारा 27, 28 और 102) पर अलग से विस्तृत लेख भी प्रकाशित कर रहे हैं, जिनके लिंक नीचे संबंधित सेक्शन में दिए गए हैं।
स्पष्टीकरण: यह एक सामान्य जानकारी वाला गाइड है, कानूनी सलाह नहीं। किसी विशिष्ट मामले में हमेशा मूल बेयर एक्ट, हरियाणा सहकारिता विभाग या किसी योग्य वकील से पुष्टि करें।
अधिनियम की पूरी संरचना — 15 अध्याय, सवा सौ से ज्यादा धाराएं
1984 का यह अधिनियम कुल 15 अध्यायों में बंटा है, जो सहकारी समिति के “जन्म से मृत्यु तक” — यानी पंजीकरण से लेकर विघटन तक — हर चरण को कवर करता है:
- अध्याय I — प्रारंभिक (धारा 1-2): अधिनियम का नाम, विस्तार और परिभाषाएं (जैसे “एपेक्स सोसाइटी”, “बाय-लॉज़”, “सदस्य”, “कमजोर वर्ग”)
- अध्याय II — पंजीकरण (धारा 3-15): कौन समिति बना सकता है, आवेदन प्रक्रिया, बाय-लॉज़ में संशोधन, समामेलन (amalgamation) और बीमार समितियों का विघटन
- अध्याय III — सदस्यों के अधिकार व दायित्व (धारा 16-24): सदस्यता की पात्रता, वोटिंग अधिकार, शेयर ट्रांसफर, पूर्व सदस्यों का दायित्व
- अध्याय IV — प्रबंधन (धारा 25-36A): आम सभा, बैठकें, कमेटी चुनाव, रजिस्ट्रार की शक्तियां, अविश्वास प्रस्ताव
- अध्याय V — कॉमन कैडर (धारा 37-38): कर्मचारियों का साझा कैडर
- अध्याय VI — विशेषाधिकार (धारा 39-46): निगमित निकाय का दर्जा, स्टाम्प शुल्क में छूट, वेतन से कटौती की व्यवस्था
- अध्याय VII — लेखा व रिकॉर्ड (धारा 47-51): खाता-बही, बैलेंस शीट, रिकॉर्ड की सुरक्षा
- अध्याय VIII — प्रभार व बंधक (धारा 52-62): फसल पर पहला हक, भूमि बंधक की प्रक्रिया
- अध्याय IX — ऋण व उधार (धारा 63-71): ऋण सीमा, कमजोर वर्ग के लिए न्यूनतम 1/3 हिस्सा आरक्षण
- अध्याय X — कुर्की व नीलामी (धारा 72-80): बकाया वसूली की प्रक्रिया
- अध्याय XI — ऑडिट (धारा 81-95): ऑडिटर नियुक्ति, रजिस्ट्रार द्वारा ऑडिट, आपत्तियों का निपटारा
- अध्याय XII — विवाद व मध्यस्थता (धारा 96-102): विवादों को रजिस्ट्रार या मध्यस्थ के पास भेजना, अवार्ड, सिविल कोर्ट की सीमित भूमिका
- अध्याय XIII — समापन (धारा 103-110): समिति बंद करने की शर्तें और प्रक्रिया
- अध्याय XIV — निरीक्षण (धारा 111-116): रजिस्ट्रार की जांच शक्तियां
- अध्याय XV — अपराध व दंड (धारा 117-125): जुर्माने का प्रावधान, कंपाउंडिंग की व्यवस्था
पंजीकरण से जुड़े मुख्य प्रावधान (अध्याय II)
कोई भी नई सहकारी समिति बनाने के लिए न्यूनतम 10 व्यस्क सदस्य चाहिए (सरकारी रोजगार योजनाओं में यह सीमा 5 तक भी हो सकती है)। रजिस्ट्रार को आवेदन मिलने के बाद अगर वे पंजीकरण अस्वीकार करते हैं, तो एक महीने के भीतर कारण सहित सूचित करना अनिवार्य है (धारा 8)। बाय-लॉज़ में कोई भी संशोधन 2/3 बहुमत और 15 दिन के नोटिस के बाद ही मान्य होता है, और रजिस्ट्रार को 3 महीने के भीतर उसका पंजीकरण करना होता है (धारा 10)। दो या अधिक समितियों का विलय (amalgamation) भी 2/3 प्रस्ताव से संभव है, और अगर लगातार तीन साल तक किसी समिति का घाटा उसकी नेटवर्थ से ज्यादा हो जाए तो उसे “बीमार समिति” मानकर विघटित किया जा सकता है (धारा 14-A)। Sahakar Watch ने पंजीकरण की व्यावहारिक, स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया पर अलग से विस्तृत गाइड भी प्रकाशित की है।
सदस्यों के अधिकार (अध्याय III)
अधिनियम के तहत हर सदस्य को समिति के मामलों में केवल एक वोट का अधिकार है (धारा 20), चाहे उसके शेयर कितने भी हों — यह सहकारी सिद्धांत “एक सदस्य, एक वोट” को कानूनी आधार देता है। वोटिंग व्यक्तिगत रूप से ही करनी होती है; प्रॉक्सी की अनुमति नहीं है, सिवाय उन मामलों के जहां कोई सहकारी समिति खुद किसी दूसरी समिति की सदस्य हो (धारा 21)। शेयर ट्रांसफर पर 2 साल की न्यूनतम होल्डिंग अवधि की शर्त है (धारा 22), और किसी सदस्य की मृत्यु के बाद उसका दायित्व अगले 2 साल तक भी बना रह सकता है, अगर उस तारीख तक कोई बकाया मौजूद हो (धारा 24)।
प्रबंधन, चुनाव और रजिस्ट्रार की शक्तियां (अध्याय IV)
यह अध्याय व्यावहारिक रूप से सबसे ज्यादा विवादों का केंद्र रहता है, क्योंकि इसी में कमेटी चुनाव, आम सभा और रजिस्ट्रार के हस्तक्षेप की शक्तियां तय होती हैं।
- धारा 25: समिति का सर्वोच्च अधिकार आम सभा (general body) में निहित होता है — वार्षिक बैठक में कार्यक्रम अनुमोदन, ऑडिट समीक्षा और कमेटी चुनाव अनिवार्य हैं।
- धारा 27: अगर कमेटी अपनी शक्तियों से बाहर जाकर कोई प्रस्ताव पास करती है, तो रजिस्ट्रार उसे अधिकतम 6 महीने के लिए निलंबित (suspend) कर सकते हैं। इस धारा पर हमने एक अलग विस्तृत लेख प्रकाशित किया है।
- धारा 28: कमेटी का चुनाव कैसे होगा, अनुसूचित जाति और महिला सदस्य का प्रतिनिधित्व अनिवार्य क्यों है, और निवर्तमान सदस्यों पर 5 साल का चुनाव प्रतिबंध कब लगता है — इस पर भी हमारा विस्तृत विश्लेषण यहां पढ़ें।
- धारा 29: अगर सरकार ने शेयर पूंजी दी है या ऋण की गारंटी ली है, तो वह कमेटी में अधिकतम 3 सदस्य या निर्वाचित सदस्यों का 1/3 हिस्सा (जो भी कम हो) नामित कर सकती है।
- धारा 33-35: अगर कमेटी मौजूद ही न हो तो रजिस्ट्रार प्रशासक नियुक्त कर सकते हैं (अधिकतम 6 महीने, सरकार की अनुमति से 2 साल तक बढ़ सकता है); अगर कमेटी लापरवाह या समिति के हित के विरुद्ध काम कर रही हो तो पूरी कमेटी हटाई जा सकती है; और किसी एक सदस्य को भी 5 साल के चुनाव प्रतिबंध के साथ हटाया जा सकता है।
ऑडिट के प्रावधान (अध्याय XI)
हर समिति को अपने बाय-लॉज़ के अनुसार ऑडिटर नियुक्त करना होता है (धारा 81), लेकिन रजिस्ट्रार खुद भी ऑडिट का निर्देश दे सकते हैं (धारा 82) और अगर समिति ऑडिटर नियुक्त करने में विफल रहे तो रजिस्ट्रार खुद ऑडिटर नियुक्त कर सकते हैं (धारा 84)। ऑडिट रिपोर्ट पर आम सभा में चर्चा और आपत्तियों का जवाब देना अनिवार्य है (धारा 85)। ऑडिट प्रक्रिया और डिजिटल ऑडिट सिस्टम पर हमारी अलग गाइड यहां पढ़ें।
विवाद व मध्यस्थता (अध्याय XII)
समिति और सदस्य, दो सदस्यों, या समिति और लेनदार के बीच कोई भी विवाद सीधे सिविल कोर्ट में नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार या सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाता है (धारा 96)। मध्यस्थ का फैसला (award) बाध्यकारी होता है, हालांकि तथ्य या कानून की स्पष्ट त्रुटि होने पर 30 दिन के भीतर रजिस्ट्रार उसे रद्द भी कर सकते हैं (धारा 99)। इस अध्याय की आखिरी धारा — धारा 102 — यह तय करती है कि इन मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र कहां तक सीमित है; इस पर हमारा विस्तृत लेख यहां उपलब्ध है। अगर आप बतौर सदस्य यह जानना चाहते हैं कि शिकायत लेकर कहां जाएं — ARCS, RCS, CM विंडो या कोर्ट — तो हमारी प्रैक्टिकल गाइड यहां पढ़ें।
समापन और अपराध-दंड (अध्याय XIII व XV)
अगर कोई समिति 2/3 प्रस्ताव से खुद बंद होना चाहे, एक साल से निष्क्रिय हो, अपने उद्देश्य पूरा करने में विफल रहे, दिवालिया हो जाए, या लगातार अधिनियम का उल्लंघन करे — तो रजिस्ट्रार उसे बंद करने (winding up) का आदेश दे सकते हैं (धारा 103)। इसके बाद लिक्विडेटर नियुक्त होता है जो संपत्ति का निपटान और लेनदारों के दावों का निपटारा करता है। अधिनियम में जुर्माने की व्यवस्था भी है — फर्जी दस्तावेज़ देने पर ₹500 तक, रिकॉर्ड न रखने पर ₹1,000 तक, गबन करने पर ₹2,000 तक और धोखाधड़ी या बार-बार उल्लंघन पर ₹5,000 तक का जुर्माना हो सकता है (धारा 117-120), और रजिस्ट्रार कुछ मामलों में जुर्माने को 50% तक कम करके “कंपाउंड” भी कर सकते हैं (धारा 122)।
यह अधिनियम 2026 में क्यों मायने रखता है
यह कानून 1984 का है, लेकिन आज भी हरियाणा की हर PACS, CM-PACS, दुग्ध समिति और मार्केटिंग सोसाइटी इसी के तहत चलती है। हाल के वर्षों में इसकी प्रासंगिकता कई मुद्दों में सामने आई है — जैसे PACS कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा को लेकर Job Security Act 2024 से जुड़ा सवाल, या HAFED धान कमीशन को लेकर यूनियन का संघर्ष, जहां धारा 27 और 34 जैसे प्रावधानों की व्यावहारिक भूमिका सामने आई। आने वाले हफ्तों में Sahakar Watch इस अधिनियम की अलग-अलग धाराओं और हरियाणा सहकारी समिति नियम, 1989 (जो इस अधिनियम को लागू करने का व्यावहारिक ढांचा देते हैं) पर विस्तृत लेखों की एक सीरीज़ प्रकाशित कर रहा है।
स्रोत सूची (Source List)
- FAO LEX — The Haryana Co-operative Societies Act, 1984 (Haryana Act No. 22 of 1984), पूर्ण मूल पाठ
- केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय — Haryana Co-operative Societies Act (आधिकारिक PDF)
- India Code — Haryana Co-operative Societies Act, 1984 (22 of 1984)
- PRS India — The Haryana Co-operative Societies Act, 1984 (PDF)
- हरियाणा सहकारिता विभाग — State Acts and Rules
- CaseMine — Haryana Act 037 of 1984, Full Text & Sections
- LatestLaws — Haryana Co-Operative Societies Act 1984
- Sahakar Watch — क्या हरियाणा की PACS कर्मचारियों को Job Security Act का लाभ मिलेगा?
- Sahakar Watch — HAFED धान खरीद कमीशन विवाद












