हरियाणा सहकारिता विभाग की वेबसाइट पर एक पेज है जिसका नाम है “Schemes”। इस पेज पर विभाग ने अपनी 36 योजनाओं की सूची दी है — कहीं किसान को ब्याज में छूट, कहीं महिला सहकारी समिति को सब्सिडी, कहीं अनुसूचित जाति के सदस्यों को ब्याज सहायता, तो कहीं बैंकों और फेडरेशनों की पूंजी बढ़ाने के लिए सरकारी हिस्सेदारी। यह पेज किसी भी सहकारी सदस्य, किसान, महिला समूह या संस्था के लिए एक तरह का नक्शा है कि सरकार उनके लिए क्या-क्या लेकर आई है। लेकिन जब हमने इस पूरी सूची को बारीकी से पढ़ा, तो दो बातें साफ हुईं। पहली — इनमें से ज़्यादातर योजनाएं सीधे किसी व्यक्ति के हाथ में पैसा नहीं देतीं, बल्कि संस्थाओं (बैंकों, फेडरेशनों) की पूंजी मजबूत करती हैं। दूसरी — जो योजनाएं वाकई किसी सदस्य, किसान या महिला समिति तक सीधे पहुंचती हैं, उनमें से कई की एलिजिबिलिटी और आवेदन प्रक्रिया विभाग के अपने पेज पर भी साफ नहीं बताई गई। यह लेख इन 36 योजनाओं को समझने लायक हिस्सों में बांटकर बताता है कि कौन-सी योजना किसके लिए है, कैसे मिलती है, और अब तक का रिकॉर्ड क्या कहता है।
पहला हिस्सा: वे योजनाएं जो सीधे सदस्य या किसान तक पहुंचती हैं
ब्याज में छूट (Interest Subvention Scheme-2014): यह अल्पकालिक फसल ऋण समय पर चुकाने वालों के लिए है। हरियाणा राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (HSCARDB) के अच्छे भुगतानकर्ताओं को 50% तक ब्याज छूट मिलती है, जबकि PACS से कर्ज़ लेने वालों को 4% की छूट और कुछ मामलों में ब्याज-मुक्त कर्ज़ भी मिल सकता है। इसके ऊपर केंद्र सरकार अलग से 3% की छूट देती है। एलिजिबिलिटी सीधी है — कर्ज़ समय पर चुकाना — लेकिन आवेदन की अलग प्रक्रिया विभाग के पेज पर नहीं दी गई; व्यवहार में यह छूट संबंधित PACS या बैंक खुद खाते में समायोजित करता है। PACS जमाकर्ताओं के लिए डिपॉज़िट गारंटी स्कीम: इसके तहत किसी PACS में जमा राशि पर प्रति सदस्य ₹50,000 तक का बीमा कवर मिलता है। यह योजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हरियाणा के अपने ताज़ा बजट दस्तावेज़ बताते हैं कि राज्य की 804 में से सिर्फ 33 PACS ही मुनाफे में हैं (इस पर Sahakar Watch पहले भी विस्तार से लिख चुका है)। जब इतनी बड़ी संख्या में समितियां आर्थिक रूप से कमज़ोर हों, तो उनके जमाकर्ताओं के लिए यह गारंटी कवर कितना पर्याप्त है, यह एक वाजिब सवाल बनता है। मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक प्रोत्साहन योजना: गाय और भैंस दोनों के दूध पर ₹5 प्रति लीटर सब्सिडी, जबकि गुणवत्ता मानक से नीचे की भैंस के दूध पर ₹1 प्रति लीटर कम मिलता है। अंत्योदय परिवारों को एक साल तक ₹10 प्रति लीटर तक की विशेष दर दी जाती है। लाभार्थी हैं वे किसान जो सहकारी दुग्ध समितियों को दूध बेचते हैं; भुगतान संबंधित दुग्ध सहकारी समिति के ज़रिए होता है। महिला सहकारी समितियों को सब्सिडी: सब्ज़ी और फल की गुणवत्ता सुधारने के मकसद से महिला सहकारी समितियों को केंद्रीय सहकारी बैंकों से ₹5 लाख तक का कर्ज़ मिल सकता है, जिसमें 20% या अधिकतम ₹1 लाख तक की राशि सरकारी सब्सिडी होती है। एलिजिबिलिटी है — पंजीकृत महिला सहकारी समिति होना; आवेदन संबंधित ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank) के ज़रिए करना होता है। अनुसूचित जाति सदस्यों के लिए ब्याज सब्सिडी: PACS, HSCARDB, केंद्रीय सहकारी बैंकों या भूमि विकास बैंकों से जुड़े अनुसूचित जाति के सदस्यों को, समय पर कर्ज़ चुकाने की शर्त पर, 7% तक ब्याज सब्सिडी मिलती है। सहकारी श्रम एवं निर्माण समितियों को सहायता: जो समितियां कम-से-कम तीन साल पुरानी हों और जिन्होंने कम-से-कम ₹10 लाख का काम पूरा किया हो, उन्हें ₹80,000 शेयर पूंजी, ₹80,000 कार्यशील पूंजी ऋण और ₹40,000 तक प्रबंधकीय सब्सिडी मिल सकती है। आवेदन सहायक रजिस्ट्रार (Assistant Registrar) की सिफारिश के ज़रिए होता है — यह उन चंद योजनाओं में से एक है जिसमें विभाग ने आवेदन का रास्ता स्पष्ट बताया है। आवास सहकारी समितियों को कर्ज़ (Housefed के ज़रिए): शहरी क्षेत्रों में समूह आवास सहकारी समितियों को फाइनेंस मिलता है, जिसका खास ज़ोर अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबकों के उत्थान पर है। एक अलग उप-योजना खासतौर पर अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए है।
दूसरा हिस्सा: वे योजनाएं जो सीधे व्यक्ति तक नहीं, संस्थाओं तक पहुंचती हैं
विभाग की सूची में गिनें तो करीब 15 योजनाएं ऐसी हैं जिनका शीर्षक “शेयर कैपिटल टू…” से शुरू होता है — यानी सरकार खुद उस संस्था में हिस्सेदार बनकर पूंजी डालती है। इनमें शामिल हैं: HARCOFED, शहरी सहकारी बैंक (Urban Cooperative Banks), केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Banks), हार्को बैंक, ज़िला प्राइमरी कोऑपरेटिव एग्रीकल्चर बैंक (DPCARDBs), हरियाणा राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक, हाउस फेडरेशन, कोऑपरेटिव शुगर मिल्स फेडरेशन, और लेबर एंड कंस्ट्रक्शन फेडरेशन। इनका मकसद है इन संस्थाओं की पूंजी आधार इतनी मज़बूत रखना कि वे RBI के तय मानकों (जैसे CRAR यानी पूंजी पर्याप्तता अनुपात) को पूरा कर सकें और आगे कर्ज़ देने या कारोबार बढ़ाने की क्षमता बनाए रखें। दिलचस्प बात यह है कि हार्को बैंक और DPCARDBs में डाली गई राशि को राज्य सरकार बाद में नाबार्ड (NABARD) से कर्ज़ के रूप में वापस ले लेती है — यानी राज्य के खजाने पर इसका असर काफी हद तक न्यूट्रल रहता है। आम सदस्य या किसान के नज़रिए से देखा जाए तो इन योजनाओं का सीधा फायदा उसके खाते में नहीं आता, बल्कि परोक्ष रूप से उस बैंक या समिति के टिके रहने में मदद करता है जिससे वह जुड़ा है।
तीसरा हिस्सा: कंप्यूटरीकरण और बुनियादी ढांचा
PACS, HSCARDB, DPCARDBs और रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ (RCS) के दफ्तर के कंप्यूटरीकरण की तीन अलग योजनाएं हैं, जिनमें लागत का बंटवारा 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य सरकार के बीच होता है (PACS कंप्यूटरीकरण पांच साल में, बाकी तीन साल में पूरी होनी है)। विभाग के मुताबिक राज्य में 801 PACS/PCCS इकाइयां इस दायरे में आती हैं। मकसद है पारदर्शिता बढ़ाना, कर्ज़ वितरण तेज़ करना, लेन-देन की लागत घटाना और सदस्यों का भरोसा बढ़ाना। इसके अलावा डेयरी क्षेत्र में मिल्क चिलिंग सेंटर, बल्क मिल्क कूलर, टेट्रा पैक प्लांट और दूध संघों के प्रसंस्करण ढांचे को मज़बूत करने वाली आधा दर्जन योजनाएं भी हैं।
चौथा हिस्सा: चीनी मिलें और NCDC-वित्तपोषित योजनाएं
सहकारी चीनी मिलों के लिए दो अहम योजनाएं हैं — एक, गन्ना किसानों को समय पर भुगतान के लिए कर्ज़ (मौजूदा पेराई सीज़न 2025-26 के लिए राज्य ने ₹415 प्रति क्विंटल का राज्य परामर्शित मूल्य तय किया है, जबकि केंद्र का उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी FRP सिर्फ ₹355 प्रति क्विंटल है — यानी हरियाणा के किसानों को केंद्र के तय भाव से ₹60 प्रति क्विंटल ज़्यादा मिलता है)। दूसरी, बगास से सह-उत्पादन बिजली (कोजनरेशन) और शीरे से एथेनॉल बनाने के प्लांट के लिए, ताकि चीनी मिलों की अतिरिक्त कमाई हो और घाटा कम हो। इसके अलावा फल-सब्ज़ी और मार्केटिंग सोसाइटियों तथा PACS की शेयर पूंजी बढ़ाने वाली तीन योजनाएं पूरी तरह राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) द्वारा वित्तपोषित हैं, यानी इनमें राज्य का सीधा खर्च नहीं है।
अब तक का रिकॉर्ड क्या कहता है
यहीं पर सवाल उठता है कि कागज़ पर बनी इतनी सारी योजनाओं का ज़मीनी असर कितना है। सबसे बड़ा संकेत खुद हरियाणा सरकार के 2026-27 के बजट दस्तावेज़ों से मिलता है, जिसमें साफ लिखा है कि राज्य की 804 PACS में से सिर्फ 33 ही मुनाफे में हैं — यानी दशकों से चल रही ब्याज छूट, शेयर पूंजी सहायता और कंप्यूटरीकरण जैसी योजनाओं के बावजूद 96% PACS या तो घाटे में हैं या मुश्किल से टिकी हैं। दूसरा संकेत सितंबर 2025 का है। 9 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सिविल सचिवालय में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सहकारिता विभाग की एक समीक्षा बैठक की, जिसमें उन्होंने अधिकारियों को कई निर्देश दिए — महिला-केंद्रित PACS का गठन तेज़ करना, सभी सहकारी बैंकों को आधुनिक IT ढांचे से लैस करना, किसानों को PM-KISAN जैसी सब्सिडी सीधे सहकारी बैंकिंग चैनल से देना, नई PACS के पंजीकरण की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनाना, और अस्पतालों के पास जन औषधि केंद्र खोलने के लिए जगह तलाशना। इसी बैठक में वीटा बूथों में महिलाओं के लिए कम-से-कम 50% आरक्षण का निर्देश भी दिया गया। अगर जुलाई 2025 में हुए बड़े ऐलानों (जिन पर Sahakar Watch पहले रिपोर्ट कर चुका है) के करीब दो महीने बाद भी मुख्यमंत्री को खुद अधिकारियों से “रफ्तार तेज़ करने” के लिए कहना पड़े, तो यह इस बात का साफ संकेत है कि उस समय तक कार्यान्वयन (implementation) अपनी तय गति से पीछे चल रहा था। यह किसी योजना के गलत होने का सबूत नहीं है, लेकिन यह ज़रूर बताता है कि योजना बनाने और उसे ज़मीन पर उतारने के बीच का फासला हरियाणा की सहकारी व्यवस्था में भी उतना ही असली है जितना कहीं और।
एक और समस्या: खुद विभाग के पेज पर अधूरी जानकारी
निष्पक्ष होकर देखें तो एक और बात कहनी ज़रूरी है। हमने जब विभाग के अपने Schemes पेज को बारीकी से पढ़ा, तो कई योजनाओं के आगे एलिजिबिलिटी और आवेदन प्रक्रिया वाले कॉलम खाली या अस्पष्ट थे। जैसे HARCOFED के ज़रिए सदस्य शिक्षा एवं नेतृत्व प्रशिक्षण योजना में यह नहीं बताया गया कि कोई सामान्य सदस्य इसका फायदा लेने के लिए कहां संपर्क करे। सब्ज़ी व फल उत्पादक सहकारी समितियों की सब्सिडी योजना में भी आवेदन का तरीका स्पष्ट नहीं है। जिस पेज का मकसद ही आम सहकारी सदस्य को जानकारी देना है, अगर उसी पर “आवेदन कैसे करें” जैसी बुनियादी जानकारी अधूरी रह जाए, तो यह पारदर्शिता की दिशा में एक असली कमी है — ऐसी कमी जिसे विभाग आसानी से दूर कर सकता है।
यह जानकारी किनके लिए और क्यों ज़रूरी है
यह पूरी सूची अलग-अलग तरह के लोगों के लिए अलग मायने रखती है। कोई किसान जो फसल ऋण समय पर चुकाता है, उसे ब्याज छूट योजना के बारे में पता होना चाहिए ताकि वह अपनी PACS से इसका दावा कर सके। कोई महिला समूह जो सहकारी समिति बनाना चाहता है, उसे महिला सहकारी सब्सिडी और आने वाली महिला-केंद्रित PACS योजना दोनों पर नज़र रखनी चाहिए। PACS में पैसा जमा कराने वाला हर सदस्य डिपॉज़िट गारंटी स्कीम की सीमा (₹50,000) जानकर ही यह तय कर सकता है कि उसे कितना जमा एक ही समिति में रखना चाहिए। अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए ब्याज सब्सिडी और आवास ऋण की उप-योजनाएं सीधे उनके वित्तीय बोझ को कम करने वाली हैं। सहकारी श्रम एवं निर्माण समितियों से जुड़े ठेकेदार-कर्मचारियों के लिए पूंजी सहायता योजना काम आ सकती है। गन्ना किसानों के लिए राज्य परामर्शित मूल्य और हार्वेस्टिंग मशीन ऋण की जानकारी सीधे उनकी आमदनी से जुड़ी है। और हार्को बैंक, ज़िला सहकारी बैंकों व विभिन्न फेडरेशनों के बोर्ड सदस्यों तथा कर्मचारियों के लिए शेयर पूंजी वाली योजनाएं उनकी संस्था की वित्तीय सेहत से जुड़ा मामला हैं। सहकारिता क्षेत्र पर नज़र रखने वाले पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए यह पूरी सूची एक बेंचमार्क का काम करती है — अगली बार जब कोई नई घोषणा हो, तो यह देखा जा सकता है कि वह पहले से मौजूद किसी योजना का विस्तार है या वाकई कुछ नया।
निष्कर्ष
हरियाणा सहकारिता विभाग की यह 36 योजनाओं वाली सूची इस बात का सबूत है कि राज्य सरकार सहकारी क्षेत्र को अलग-अलग कोणों से सहारा देने की कोशिश कर रही है — चाहे वह किसान का ब्याज हो, महिला समिति की सब्सिडी हो, या किसी बैंक की पूंजी। लेकिन असली सवाल योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि उनका असर है। जब राज्य की अपनी 804 में से सिर्फ 33 PACS मुनाफे में हों, और मुख्यमंत्री को खुद अफसरों से रफ्तार बढ़ाने के लिए कहना पड़े, तो यह साफ है कि योजनाएं बनाना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है यह सुनिश्चित करना कि वे असल में उस आखिरी किसान, महिला या सदस्य तक पहुंचें जिनके नाम पर ये बनाई गई हैं।
स्रोत सूची (Source List)
- Cooperation Department, Government of Haryana — Schemes (आधिकारिक स्रोत)
- PRS India — Haryana Budget Analysis 2026-27 (33 of 804 PACS profitable)
- The Tribune — CM directs 50% quota for women in Vita booths, speedy rollout of coop schemes
- The Tribune — New cooperative policy to revolutionise society: Dr Sharma
- ANI News — Haryana CM releases subsidy under Mukhya Mantri Dugdh Utpadak Protsahan Yojana
- HARCO Bank — About Us (structure, branches, membership)
- Ministry of Cooperation, Government of India — PACS Related Schemes
- Sahakar Watch — हरियाणा में CM-PACS और नई सुविधाओं की घोषणाएं, लेकिन बजट दस्तावेज़ बताते हैं: 804 में से सिर्फ 33 PACS मुनाफे में
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