CM-PACS बनाना और कारोबार शुरू करना सिर्फ आधा काम है। कानून हर सोसाइटी को अपने पैसे का हिसाब-किताब एक तय, पारदर्शी तरीके से रखने और हर साल उसकी जांच (ऑडिट) कराने के लिए भी बाध्य करता है — चाहे सोसाइटी छोटी हो या बड़ी। हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 में इसके साफ नियम दिए गए हैं।
खाता-बही किस तरीके से रखनी होती है
नियम 78 के मुताबिक, हर सहकारी सोसाइटी को अपनी खाता-बही (account books) और दूसरे रिकॉर्ड उसी फॉर्म और तरीके में रखने होते हैं, जो रजिस्ट्रार समय-समय पर सामान्य या विशेष आदेश जारी करके तय करे। यानी CM-PACS अपनी मर्ज़ी से कोई भी अकाउंटिंग फॉर्मेट नहीं अपना सकती — उसे रजिस्ट्रार के तय किए गए फॉर्मेट में ही हिसाब रखना होगा, ताकि हर सोसाइटी के खाते एक जैसे ढांचे में हों और उनकी तुलना और जांच आसान हो।
बैलेंस शीट कब तक तैयार करनी है
नियम 79 एक साफ समय-सीमा तय करता है — सोसाइटी को अपना बैलेंस शीट, प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट, ट्रेडिंग अकाउंट और ऐसे ही दूसरे वित्तीय विवरण, कोऑपरेटिव वर्ष खत्म होने के तीन महीने के भीतर तैयार करने होते हैं — वह भी रजिस्ट्रार के तय किए गए फॉर्मेट में। यानी सिर्फ हिसाब रखना काफी नहीं, उसे साल खत्म होते ही जल्दी और तय ढांचे में पूरा करना भी ज़रूरी है।
ऑडिट कौन करता है
नियम 77 के मुताबिक, सोसाइटी के खातों का ऑडिट उसी तरीके से होगा जो रजिस्ट्रार समय-समय पर तय करे। सीधे शब्दों में, CM-PACS खुद अपनी पसंद का कोई भी ऑडिटर नियुक्त नहीं कर सकती — यह रजिस्ट्रार यानी सहकारिता विभाग के दायरे में तय होता है। इसी वजह से अधिनियम की धारा 25(3)(b) यह भी तय करती है कि हर सोसाइटी की वार्षिक आम बैठक (annual general meeting) में ऑडिट रिपोर्ट और वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा होनी ही चाहिए — यानी ऑडिट सिर्फ एक कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि सदस्यों के सामने रखी जाने वाली जवाबदेही है।
ऑडिट फीस भी देनी होती है
नियम 80 के मुताबिक, हर सहकारी सोसाइटी को अपने खातों के ऑडिट के लिए हर कोऑपरेटिव वर्ष में सरकार को फीस देनी होती है — यह फीस सरकार की पूर्व मंज़ूरी से रजिस्ट्रार द्वारा तय किए गए स्केल के मुताबिक, सोसाइटी की श्रेणी के आधार पर तय होती है। यानी रजिस्ट्रेशन के वक्त लगने वाली फीस की तरह, ऑडिट फीस भी अधिनियम में सीधे तय नहीं है — यह रजिस्ट्रार के अलग आदेश से तय होती है, जिसकी जानकारी सोसाइटी को सीधे ARCS दफ्तर से लेनी चाहिए।
CM-PACS के लिए यह क्यों ज़्यादा ज़रूरी है
चूंकि CM-PACS एक साथ खाद-बीज, डेयरी, LPG डीलरशिप, फेयर प्राइस शॉप जैसी कई गतिविधियां चला सकती है, इसलिए हिसाब-किताब रखते वक्त हर गतिविधि की कमाई और खर्च अलग-अलग दर्ज करना बेहद ज़रूरी हो जाता है — यह सिर्फ ऑडिट पास कराने के लिए नहीं, बल्कि टैक्स की सही गणना के लिए भी ज़रूरी है, जैसा हमने धारा 80P पर पिछली पोस्ट में बताया था — वहां भी गतिविधि-वार हिसाब रखे बिना सही टैक्स छूट का दावा करना मुश्किल हो जाता है। इसी तरह साल भर के मुनाफे में से रिज़र्व फंड में जाने वाला हिस्सा भी साफ तौर पर दिखना चाहिए, जिस पर हमने अलग पोस्ट में विस्तार से लिखा है।
स्रोत सूची (Source List)
हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 — नियम 77, 78, 79, 80
हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 — धारा 25(3)(b)
Sahakar Watch — CM-PACS की कमाई पर टैक्स छूट कितनी मिलती है? धारा 80P पूरी तरह समझिए
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