बहुत सी सहकारी समितियां यह मानकर चलती हैं कि जब वे सिर्फ अपने ही सदस्यों को सामान या सेवा देती हैं, तो उस पर GST नहीं लगना चाहिए — आखिर यह तो “अपनों के बीच” का लेन-देन है, कोई बाहरी ग्राहक नहीं। इसे कानून की भाषा में “म्यूचुअलिटी का सिद्धांत” (doctrine of mutuality) कहा जाता है। लेकिन CM-PACS जैसी समिति के लिए यह सवाल जितना सीधा लगता है, कानूनी तौर पर उतना ही उलझा हुआ है — और इसका जवाब पिछले कुछ सालों में कई बार बदला है।
GST रजिस्ट्रेशन कब ज़रूरी होता है
सबसे पहले बुनियादी नियम समझें। CGST अधिनियम, 2017 की धारा 22 के तहत, अगर किसी संस्था का सालाना टर्नओवर तय सीमा से ऊपर चला जाता है तो उसे GST में रजिस्टर होना ज़रूरी है। हरियाणा जैसे सामान्य श्रेणी (normal category) राज्य में यह सीमा वस्तुओं (goods) की बिक्री के लिए ₹40 लाख और सिर्फ सेवाओं (services) के लिए ₹20 लाख सालाना है। चूंकि CM-PACS खाद-बीज से लेकर LPG और फेयर प्राइस शॉप तक कई तरह की वस्तुएं बेच सकती है, इस सीमा को पार करते ही रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो जाता है।
“म्यूचुअलिटी” का सिद्धांत क्या है
यह सिद्धांत काफी पुराना है और सर्विस टैक्स के ज़माने से चला आ रहा है। मूल विचार यह है कि कोई व्यक्ति या संस्था खुद से व्यापार नहीं कर सकती — यानी अगर कोई क्लब या सोसाइटी अपने ही सदस्यों को कुछ बेचती है, तो कानूनी तौर पर यह “बेचने वाला” और “खरीदने वाला” अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही समूह माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के State of West Bengal बनाम Calcutta Club मामले में इस सिद्धांत को सर्विस टैक्स के दौर में मान्यता दी थी।
2021 का संशोधन — सरकार ने कानून ही बदल दिया
GST आने के बाद सरकार ने इस सिद्धांत को सीमित करने के लिए फाइनेंस एक्ट 2021 के ज़रिए CGST अधिनियम में धारा 7(1)(aa) जोड़ी — और इसे 1 जुलाई 2017 से पूर्वव्यापी (retrospective) असर से लागू किया। इस धारा के मुताबिक, कोई क्लब, एसोसिएशन या सोसाइटी और उसके सदस्य कानूनी तौर पर दो अलग-अलग “व्यक्ति” (persons) माने जाएंगे — यानी सदस्यों को दी गई सप्लाई भी एक टैक्स योग्य सप्लाई मानी जाएगी, भले ही म्यूचुअलिटी का पुराना तर्क कुछ भी कहे। सीधे शब्दों में, सरकार ने कानून बदलकर मुनाफे की मंशा वाली इस बहस को खत्म करने की कोशिश की।
ताज़ा उलझन — केरल हाईकोर्ट का फैसला
लेकिन यह मामला यहीं नहीं थमा। अप्रैल 2025 में केरल हाईकोर्ट ने Indian Medical Association से जुड़े एक मामले में धारा 7(1)(aa) को असंवैधानिक करार दे दिया — अदालत का कहना था कि पूर्वव्यापी असर से इस तरह टैक्स का आधार बदलना कानून के राज (rule of law) के खिलाफ है, और म्यूचुअलिटी का सिद्धांत संविधान से जुड़ा है, इसलिए सिर्फ कानून बदलकर इसे खत्म नहीं किया जा सकता। यह फैसला क्लब और एसोसिएशन से जुड़े एक मामले में आया है, कोऑपरेटिव सोसाइटी को लेकर सीधे तौर पर नहीं, और उम्मीद है कि सरकार इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। यानी फिलहाल यह कानूनी स्थिति पूरे देश में साफ तौर पर तय नहीं है, और जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, इस पर भरोसा करके GST जमा करना बंद कर देना जोखिम भरा हो सकता है।
कृषि से जुड़ी सेवाओं पर अलग और तय छूट
म्यूचुअलिटी की इस बहस से अलग, एक और रास्ता है जो CM-PACS के लिए ज़्यादा भरोसेमंद है। नोटिफिकेशन 12/2017-केंद्रीय कर (दर) के तहत, कृषि उपज (agricultural produce) से जुड़ी कुछ सेवाओं पर पहले से साफ छूट है — जैसे लोडिंग, अनलोडिंग, पैकिंग, भंडारण (storage) या वेयरहाउसिंग, और उपज की खरीद-बिक्री में कमीशन एजेंट की सेवा। खेत के स्तर पर होने वाली सफाई, ग्रेडिंग, छंटाई या सुखाने जैसी प्रक्रियाएं भी छूट में आती हैं, बशर्ते इनसे उपज का मूल स्वरूप न बदले। ध्यान रहे, यह परिभाषा सीमित है — जैसे ही उपज पर ऐसी प्रोसेसिंग होती है जो उसका मूल स्वरूप बदल दे (जैसे दाल की छिलाई या चावल की मिलिंग), वह “कृषि उपज” की परिभाषा से बाहर हो जाती है और छूट खत्म हो जाती है। यानी CM-PACS की डेयरी कलेक्शन, ग्रेडिंग-पैकेजिंग या भंडारण जैसी गतिविधियों को इस अलग, ज़्यादा भरोसेमंद छूट के तहत परखा जाना चाहिए, न कि सिर्फ अपने सदस्यों से जुड़े होने के तर्क पर।
व्यावहारिक सलाह
चूंकि CM-PACS का कारोबार कई हिस्सों में बंटा है — कुछ हिस्सा साफ तौर पर टैक्स योग्य (जैसे LPG डीलरशिप, फेयर प्राइस शॉप), कुछ हिस्सा कृषि उपज से जुड़ी तय छूट में आ सकता है, और सदस्यों को की गई सामान्य बिक्री का सवाल फिलहाल कानूनी तौर पर उलझा है — इसलिए हर गतिविधि का हिसाब अलग रखना और थ्रेशोल्ड पार होते ही रजिस्ट्रेशन करा लेना सबसे सुरक्षित रास्ता है। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं — असल फैसला लेने से पहले किसी GST प्रैक्टिशनर या टैक्स सलाहकार से अपनी समिति की विशेष स्थिति पर सलाह ज़रूर लें, क्योंकि यह क्षेत्र अभी भी बदल रहा है।
स्रोत सूची (Source List)
CGST अधिनियम, 2017 — धारा 22 (रजिस्ट्रेशन सीमा), धारा 7(1)(aa) (फाइनेंस एक्ट 2021 से जोड़ी गई)
State of West Bengal vs Calcutta Club Ltd., सुप्रीम कोर्ट, 2019
Indian Medical Association vs Union of India, केरल हाईकोर्ट, अप्रैल 2025
नोटिफिकेशन 12/2017-केंद्रीय कर (दर) — कृषि उपज से जुड़ी सेवाओं पर छूट
Sahakar Watch — सिर्फ खाद-बीज की समिति नहीं: हरियाणा की CM-PACS कितने तरह के कारोबार कर सकती है?
Sahakar Watch — CM-PACS की कमाई पर टैक्स छूट कितनी मिलती है? धारा 80P पूरी तरह समझिए











