एक बार CM-PACS रजिस्टर हो जाने के बाद उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती। समय के साथ सोसाइटी को अपने बाय-लॉज़ में बदलाव करने, कोई नया कारोबार जोड़ने, किसी दूसरी सोसाइटी के साथ मिलने या कभी-कभी पूरी तरह बंद होने की नौबत भी आ सकती है। हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 में इन सभी स्थितियों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं।
बाय-लॉज़ में बदलाव कैसे होता है
धारा 10 के मुताबिक किसी भी सहकारी सोसाइटी के बाय-लॉज़ में किया गया संशोधन तब तक मान्य नहीं माना जाता जब तक वह इस अधिनियम के तहत रजिस्टर न हो जाए। संशोधन का प्रस्ताव रजिस्ट्रार के पास भेजा जाता है, जो यह जांचता है कि प्रस्तावित बदलाव अधिनियम, नियमों और सहकारी सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। मंज़ूरी मिलने पर रजिस्ट्रार संशोधित बाय-लॉज़ की एक प्रति और एक प्रमाण पत्र सोसाइटी को भेजता है। अगर प्रस्ताव खारिज होता है, तो रजिस्ट्रार को इसकी वजह भी बतानी होती है।
नई गतिविधि जोड़नी हो तो यही रास्ता अपनाना होगा
CM-PACS के मॉडल बाय-लॉज़ में जो गतिविधियां पहले से शामिल हैं, हमने उन्हें अपने पहले के लेख में विस्तार से बताया था। लेकिन अगर आगे चलकर कोई ऐसा नया काम सामने आए जो इस सूची में नहीं है, तो उसे जोड़ने के लिए भी यही संशोधन प्रक्रिया अपनानी होती है — पहले जनरल बॉडी की मंज़ूरी, फिर रजिस्ट्रार की अनुमति। यानी नई गतिविधि जोड़ना सोसाइटी अपने स्तर पर अकेले तय नहीं कर सकती।
दो सोसाइटियों का विलय (amalgamation)
कई बार आस-पास के गांवों की छोटी सोसाइटियां मिलकर एक बड़ी CM-PACS बनाने पर विचार करती हैं। अधिनियम की धारा 15 इस स्थिति को भी कवर करती है — जब किसी सोसाइटी की संपत्ति और देनदारियां किसी दूसरी सोसाइटी को ट्रांसफर हो जाती हैं, तो पुरानी सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन खुद-ब-खुद रद्द माना जाता है और उसे भंग (dissolved) समझा जाता है। यह प्रावधान खासकर उन इलाकों के लिए काम का है जहां कई छोटी समितियां मिलकर एक व्यवहार्य CM-PACS बनाने पर विचार कर रही हों।
सोसाइटी को औपचारिक रूप से बंद करना
अगर सोसाइटी आर्थिक रूप से चलने लायक नहीं रह जाती या लगातार निष्क्रिय रहती है, तो अधिनियम की धारा 105 के तहत रजिस्ट्रार उसे समेटने यानी वाइंड-अप करने का आदेश दे सकता है, जिसके बाद एक लिक्विडेटर नियुक्त होता है जो सोसाइटी के हिसाब-किताब को निपटाने का काम देखता है। यहां एक बात ध्यान रखने वाली है — धारा 24(2) के मुताबिक वाइंड-अप का आदेश आने के बाद भी किसी पूर्व सदस्य या दिवंगत सदस्य की संपत्ति की देनदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि वह कानून के मुताबिक तय सीमा तक बनी रहती है। यानी सोसाइटी छोड़ देने या बंद हो जाने से पुराना हिसाब अपने आप साफ नहीं हो जाता।
निष्कर्ष
बदलाव हो, विलय हो या बंद करने की नौबत — तीनों ही स्थितियों में आखिरी फैसला अकेले सोसाइटी का नहीं, रजिस्ट्रार की मंज़ूरी का होता है। इसीलिए शुरुआत से ही रिकॉर्ड और कागज़ी काम साफ-सुथरा रखना सिर्फ रजिस्ट्रेशन के वक्त नहीं, सोसाइटी के पूरे जीवनकाल में काम आता है।
स्रोत सूची (Source List)
- हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 — धारा 10, 15, 24(2), 105
- Sahakar Watch — हरियाणा में CM-PACS रजिस्टर कैसे करें?
- Sahakar Watch — हरियाणा की CM-PACS कितने तरह के कारोबार कर सकती है?











