गांव में जब कोई नई CM-PACS बनती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है — यह कोई सरकारी स्कीम है जो कभी भी बंद हो सकती है, या यह एक पक्की, कानूनी संस्था है जिसकी अपनी अलग हैसियत है? जवाब समझने के लिए हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 की धारा 4 और धारा 39 को देखना पड़ेगा, जो यह तय करती हैं कि कोई सोसाइटी कब और किस आधार पर रजिस्टर होती है, और रजिस्टर होने के बाद उसे कानूनी तौर पर क्या हैसियत मिलती है।
धारा 4 का “ऑब्जेक्ट टेस्ट” — रजिस्ट्रेशन की असली शर्त
अधिनियम की धारा 4(1) के मुताबिक, कोई भी सोसाइटी तभी रजिस्टर की जा सकती है जब उसका मकसद “सहकारी सिद्धांतों (co-operative principles) के मुताबिक अपने सदस्यों के आर्थिक हितों को बढ़ावा देना” हो — या फिर वह ऐसी ही किसी सोसाइटी के काम को आसान बनाने के लिए बनी हो। इसे ही “ऑब्जेक्ट टेस्ट” कहा जा सकता है, क्योंकि रजिस्ट्रार सिर्फ कागज़ी औपचारिकता नहीं देखता — वह यह जांचता है कि सोसाइटी का असली मकसद कानून की इस कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं। “सहकारी सिद्धांत” शब्द को अधिनियम की धारा 2(eb) में परिभाषित किया गया है, और इसका मतलब वही सिद्धांत हैं जो अधिनियम की अनुसूची (Schedule) में तय किए गए हैं। यानी कोई भी संस्था मनमाने ढंग से खुद को “सहकारी सोसाइटी” घोषित नहीं कर सकती — उसे इस तय कसौटी पर परखा जाता है, तभी रजिस्ट्रेशन मिलता है। हमने रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया पर पहले भी बात की थी — धारा 4 इसी प्रक्रिया की कानूनी बुनियाद है।
CM-PACS किस श्रेणी की सोसाइटी है
अधिनियम की धारा 2(o) एक “प्राइमरी सोसाइटी” (primary society) को परिभाषित करती है — ऐसी सहकारी सोसाइटी जिसका मकसद अपने सदस्यों के साझा हितों को बढ़ावा देना हो, और जिसकी सदस्यता सिर्फ व्यक्तियों (individuals) तक सीमित हो। CM-PACS इसी श्रेणी में रजिस्टर होती है — गांव या पंचायत-क्लस्टर के व्यक्ति सदस्य बनते हैं, कोई और सोसाइटी इसकी सदस्य नहीं होती। ध्यान रहे, इसी सामान्य कानूनी ढांचे के तहत PACS (Primary Agriculture Credit Society) भी एक प्राइमरी सोसाइटी के तौर पर रजिस्टर होती है, लेकिन दोनों का मकसद और कामकाज बिल्कुल अलग है — PACS सिर्फ खेती से जुड़े कर्ज़ और साख के लिए बनी है, जबकि CM-PACS का दायरा कहीं व्यापक है। यह फर्क हमने CM-PACS क्या है, इस पोस्ट में विस्तार से समझाया है।
रजिस्ट्रेशन के बाद मिलती है असली कानूनी हैसियत — धारा 39
यहीं असली सवाल का जवाब मिलता है। अधिनियम की धारा 39 साफ कहती है कि इस अधिनियम के तहत रजिस्टर हुई हर सहकारी सोसाइटी एक “बॉडी कॉर्पोरेट” (body corporate) होती है — यानी उसकी अपनी, अपने सदस्यों से अलग, कानूनी पहचान होती है। इसका मतलब है सोसाइटी को स्थायी उत्तराधिकार (perpetual succession) और अपनी मुहर (common seal) मिलती है, वह अपने नाम पर ज़मीन-जायदाद रख सकती है, करार (contract) कर सकती है, और ज़रूरत पड़ने पर मुकदमा दायर कर सकती है या उस पर मुकदमा किया जा सकता है। यानी CM-PACS कोई अस्थायी सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि गांव के लोगों की अपनी एक स्वतंत्र, पंजीकृत संस्था है, जो सरकारी नीति से बनी ज़रूर है, लेकिन कानूनी तौर पर उतनी ही पक्की है जितनी कोई भी दूसरी रजिस्टर्ड सहकारी सोसाइटी।
रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का मतलब — धारा 9
धारा 9 के मुताबिक, रजिस्ट्रार जो रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी करता है, वह अपने आप में इस बात का “पक्का सबूत” (conclusive evidence) माना जाता है कि सोसाइटी अधिनियम के तहत वैध रूप से रजिस्टर हो चुकी है। व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब यह है कि एक बार सर्टिफिकेट मिल जाने के बाद, बैंक, सरकारी दफ्तर या कोई भी दूसरा पक्ष सोसाइटी की वैधता पर बार-बार सवाल नहीं उठा सकता — सर्टिफिकेट ही काफी है। इसी वजह से रजिस्ट्रेशन के फौरन बाद सोसाइटी बैंक खाता खोलने, ज़मीन खरीदने या सरकारी योजनाओं से जुड़ने जैसे काम शुरू कर पाती है, जैसा हमने पिछली पोस्ट में भी बताया था।
नाम में “Limited” क्यों जुड़ता है
एक छोटी लेकिन ज़रूरी बात — धारा 4(2) के मुताबिक, अगर कोई सोसाइटी सीमित दायित्व (limited liability) के साथ रजिस्टर होती है, तो उसके नाम के आखिर में “Limited” शब्द या उसका कोई भारतीय भाषा में समकक्ष शब्द जोड़ना ज़रूरी है। यह शब्द सिर्फ औपचारिकता नहीं — यह सदस्यों और बाहरी पक्षों दोनों को यह साफ बताता है कि सोसाइटी के डूबने की स्थिति में सदस्यों की ज़िम्मेदारी सीमित है, असीमित नहीं।
व्यावहारिक मतलब क्या है
इस पूरी कानूनी बुनियाद का मतलब सीधा है — जब कोई गांव CM-PACS बनाता है, तो वह सिर्फ किसी सरकारी घोषणा का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि एक ऐसी संस्था खड़ी करता है जिसकी अपनी कानूनी पहचान, अपनी संपत्ति रखने की ताकत, और करार करने का अधिकार होता है। यही वजह है कि CM-PACS के बंद होने, बाय-लॉज़ बदलने या दायित्व से जुड़े सवालों के जवाब भी कानून में साफ तौर पर दर्ज हैं — इस पर हमने अलग पोस्ट में विस्तार से लिखा है।
स्रोत सूची (Source List)
हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 — धारा 2(eb), 2(o), 4, 8, 9, 39
Sahakar Watch — हरियाणा में CM-PACS रजिस्टर कैसे करें? पूरी प्रक्रिया चरण-दर-चरण
Sahakar Watch — CM-PACS क्या है? हरियाणा की नई सहकारी समिति की जानकारी
Sahakar Watch — CM-PACS के बाय-लॉज़ में बदलाव या सोसाइटी बंद करने की प्रक्रिया क्या है?











