NCDC की पहल: हथकरघा सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने पर मंथन, 5 लाख से अधिक बुनकर सदस्यों की चुनौतियां केंद्र में

नई दिल्ली। भारत का हथकरघा क्षेत्र केवल कपड़ा उत्पादन का माध्यम नहीं है। इसके साथ लाखों परिवारों की आजीविका, स्थानीय कला, पारंपरिक डिजाइन और कई क्षेत्रों की सामाजिक पहचान जुड़ी हुई है। इसके बावजूद हथकरघा बुनकरों और उनकी सहकारी संस्थाओं के सामने कच्चे माल की उपलब्धता, बदलता बाजार, ब्रांडिंग, प्रशिक्षण और आधुनिक उपभोक्ता तक पहुंच जैसी चुनौतियां लंबे समय से बनी हुई हैं।

इन्हीं सवालों को लेकर राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम यानी NCDC ने नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में “Cooperative Handloom Sector in India – Current Status and Way Forward” विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की। इसमें 14 राज्य स्तरीय हथकरघा महासंघों और सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन संस्थाओं के माध्यम से देशभर के 5 लाख से अधिक हथकरघा बुनकर सदस्य जुड़े हुए बताए गए हैं।

कार्यशाला की अहमियत केवल प्रतिभागियों की संख्या में नहीं थी। इसमें कच्चे माल की आपूर्ति से लेकर उत्पाद की traceability, skill development, marketing, exports और brand building तक उन विषयों पर चर्चा हुई जो किसी handloom cooperative के वास्तविक कारोबार को प्रभावित करते हैं। Office of Development Commissioner (Handlooms), National Handloom Development Corporation और Apparel Training and Design Centre से जुड़े विशेषज्ञ भी इसमें शामिल हुए।

बुनकर के लिए असली चुनौती करघे के बाद शुरू होती है

हथकरघा क्षेत्र की चर्चा अक्सर कौशल और परंपरा के संदर्भ में होती है, लेकिन किसी बुनकर सहकारी समिति के लिए केवल अच्छा कपड़ा तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि धागा किस कीमत पर मिलेगा, तैयार माल की पहचान कैसे सुरक्षित रहेगी, डिजाइन बदलती मांग के अनुरूप हैं या नहीं, ग्राहक तक पहुंच किस माध्यम से बनेगी और बिक्री से मिलने वाला मूल्य बुनकर तक किस अनुपात में पहुंचेगा।

यही कारण है कि NCDC की कार्यशाला में raw material supply और marketing को एक ही बातचीत का हिस्सा बनाया जाना महत्वपूर्ण है।

यह समस्या केवल handloom cooperatives तक सीमित नहीं है। Sahakar Watch ने हाल ही में NAFED के FPO BizConnect पर अपनी रिपोर्ट में भी यही मुद्दा रेखांकित किया था कि किसान उत्पादक संगठन खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं है; उसकी स्थिरता अंततः इस बात पर निर्भर करती है कि उसके उत्पाद को नियमित खरीदार और व्यवहारिक बाजार मिलते हैं।

हथकरघा सहकारी समितियों के मामले में यह चुनौती और जटिल हो जाती है, क्योंकि यहां उत्पाद केवल commodity नहीं होता। डिजाइन, क्षेत्रीय पहचान, बुनाई तकनीक और craftsmanship उसकी कीमत तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

पांच लाख सदस्य—इसलिए छोटी चर्चा नहीं है

14 राज्य स्तरीय संस्थाओं द्वारा पांच लाख से अधिक weaver members का प्रतिनिधित्व किया जाना इस कार्यशाला को नीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। इसका अर्थ है कि raw material, training या marketing से जुड़ा कोई सुधार यदि राज्य स्तरीय federations और primary cooperatives तक प्रभावी रूप से पहुंचता है, तो उसका असर बड़ी संख्या में परिवारों तक जा सकता है।

देश के हथकरघा क्षेत्र का आकार भी इसे केवल niche industry मानने की अनुमति नहीं देता। National Handloom Development Corporation की वेबसाइट पर चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 के आधार पर देश में 35,22,512 handloom workers का उल्लेख है।

इस विशाल workforce में सहकारी संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं—विशेषकर सामूहिक खरीद, उत्पादन योजना, डिजाइन सहयोग, विपणन और संस्थागत बिक्री में।

Traceability और branding अब केवल बड़े उद्योगों का विषय नहीं

कार्यशाला में product traceability और brand building पर जोर एक उल्लेखनीय संकेत है।

आज बाजार में handloom शब्द अपने-आप बिक्री की गारंटी नहीं देता। उपभोक्ता यह भी जानना चाहता है कि उत्पाद वास्तव में handwoven है या नहीं, किस क्षेत्र का है, किस प्रकार के yarn का उपयोग हुआ है और उसकी मूल पहचान क्या है।

यदि cooperative federation अपने सदस्यों के उत्पाद को identifiable brand, standardized labelling और reliable traceability के साथ बाजार में पेश कर सके तो इससे दो फायदे हो सकते हैं—ग्राहक का भरोसा बढ़ेगा और बुनकर का उत्पाद generic textile की कीमत पर बिकने से बच सकता है।

NHDC भी artisans और weavers से सीधे प्राप्त authentic products को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए अपने Tantrika brand के माध्यम से direct market interface विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। संस्था इसे indigenous textile traditions की visibility और fair trade practices बढ़ाने से जोड़ती है।

यह बताता है कि handloom policy में अब उत्पादन के साथ market presentation भी उतना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

डिजिटल व्यवस्था जरूरी है, लेकिन अकेली पर्याप्त नहीं

सहकारी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में digitisation पर लगातार जोर बढ़ा है। Sahakar Watch ने अपनी पिछली रिपोर्ट “असम में सहकारी समितियों का पंजीकरण पूरी तरह ऑनलाइन” में देखा कि प्रशासनिक प्रक्रिया को digital बनाने से नई संस्थाओं के गठन में समय और अनिश्चितता कम की जा सकती है।

लेकिन handloom sector एक दूसरा पक्ष सामने रखता है।

Registration आसान हो जाना शुरुआत है। संस्था बनने के बाद उसे चलाने के लिए professional accounting, inventory management, costing, सदस्य भुगतान, raw-material planning, online catalogue, buyer database और बिक्री की नियमित व्यवस्था चाहिए।

यानी cooperative digitisation का अगला चरण केवल Registrar portal नहीं, बल्कि business operations का digitisation होना चाहिए।

Marketing और exports पर चर्चा क्यों महत्वपूर्ण है

भारत के कई handloom clusters की पहचान राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है। फिर भी प्रत्येक primary weaving cooperative स्वयं export market तक नहीं पहुंच सकता।

यहां state federations, NCDC, NHDC और अन्य institutions की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। Cooperative model के माध्यम से छोटे उत्पादकों को aggregate करके बड़ी quantity, consistent quality और common branding उपलब्ध कराई जा सकती है।

NCDC workshop में marketing और exports को प्रमुख विषयों में शामिल किया जाना इसी दिशा का संकेत है। हालांकि असली सफलता workshop के बाद दिखाई देगी—कितनी societies को buyer connections मिले, कितने उत्पादों को branding support मिला, training से क्या measurable improvement हुआ और cooperative members की income पर इसका क्या प्रभाव पड़ा।

सहकारी संस्थाओं के लिए बड़ा संदेश

इस पूरी चर्चा का सार शायद यह है कि पुरानी cooperative structure को आधुनिक market structure से जोड़ना होगा।

बुनकर के पास कौशल है। Cooperative के पास collective strength हो सकती है। Government institutions के पास schemes, finance और training infrastructure है। लेकिन इन तीनों के बीच coordination कमजोर रहा तो तैयार उत्पाद बाजार की दौड़ में पीछे रह सकता है।

NCDC की कार्यशाला में raw material, traceability, training, exports, branding और collaboration को एक साथ रखा जाना इसलिए सही दिशा का कदम दिखाई देता है।

अब जरूरत यह है कि ऐसी बैठकों से निकलने वाले सुझाव measurable action plan में बदलें—किस federation को क्या सहायता मिली, किस cluster की कौन-सी समस्या हल हुई और अंततः बुनकर सदस्य की आय में क्या अंतर आया।

क्योंकि सहकारी क्षेत्र की सफलता का अंतिम पैमाना बैठक, योजना या संस्था की संख्या नहीं, बल्कि उसके सदस्य को मिलने वाला वास्तविक आर्थिक लाभ होना चाहिए।

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