असम में सहकारी समितियों का पंजीकरण पूरी तरह ऑनलाइन: डेयरी समितियों को एक दिन में प्रमाणपत्र देने का लक्ष्य

गुवाहाटी। सहकारी समिति बनाना कई राज्यों में आज भी ऐसा काम है जिसमें आवेदन, दस्तावेज, कार्यालयों के चक्कर और अलग-अलग स्तर पर जांच में काफी समय लग जाता है। असम सरकार ने इस प्रक्रिया को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने सहकारी समितियों के पंजीकरण की व्यवस्था को पूरी तरह ऑनलाइन करने का निर्णय लिया है। खास बात यह है कि नई व्यवस्था में डेयरी सहकारी समितियों को एक दिन में और अन्य सहकारी समितियों को 30 दिनों के भीतर पंजीकरण प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

यह फैसला केवल आवेदन ऑनलाइन लेने तक सीमित प्रशासनिक बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सहकारी क्षेत्र के लिए इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि किसी नई संस्था के गठन में सबसे पहला औपचारिक पड़ाव ही registration होता है। यदि यही प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित हो तो सदस्य जुटाने, बैंक खाता खोलने, कारोबार शुरू करने और सरकारी योजनाओं से जुड़ने जैसे अगले कदम भी पीछे खिसक जाते हैं।

असम के Cooperation Minister Kaushik Rai ने राज्य मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए इसे ease of doing business की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार बताया है। मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस व्यवस्था को मंजूरी दी गई। सरकार का कहना है कि इससे किसानों, दुग्ध उत्पादकों और कृषि आधारित उद्यमियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

डेयरी सहकारी समितियों के लिए एक दिन की समयसीमा क्यों महत्वपूर्ण है?

इस फैसले का सबसे दिलचस्प हिस्सा dairy cooperatives के लिए प्रस्तावित एक दिन की registration timeline है।

डेयरी व्यवसाय में किसान के लिए समय का महत्व सामान्य कारोबारी गतिविधि से भी अधिक होता है। दूध रोज पैदा होता है और उसकी खरीद, chilling, transportation तथा payment का चक्र भी लगातार चलता है। ऐसे में गांव के दुग्ध उत्पादक यदि नई cooperative बनाना चाहते हैं तो महीनों तक registration का इंतजार करना उनके लिए व्यावहारिक कठिनाई पैदा कर सकता है।

असम सरकार के मौजूदा आधिकारिक dairy portal पर उपलब्ध पुरानी प्रक्रिया को देखें तो registration में feasibility verification, promoter meeting, bye-laws और अन्य दस्तावेजों की जांच जैसे कई चरण शामिल हैं। वहां कम-से-कम 10 वयस्क promoters, proposed bye-laws, applicants की सूची, viability scheme और cooperative principles के प्रति commitment declaration जैसे दस्तावेजों की आवश्यकता बताई गई है। उसी पुराने service description में प्रक्रिया को offline भी बताया गया है और सामान्यतः एक महीने में पूरा करने का उल्लेख है।

यहीं नए निर्णय का वास्तविक महत्व सामने आता है। यदि पुराने verification और legal scrutiny को कमजोर किए बिना workflow डिजिटल किया जाता है, तो सरकार को आवेदन की speed और compliance—दोनों में संतुलन बनाना होगा।

ऑनलाइन होने का अर्थ केवल PDF अपलोड करना नहीं होना चाहिए

सरकारी सेवाओं में “online” शब्द का उपयोग अब आम हो गया है, लेकिन अच्छी digital service की पहचान केवल यह नहीं है कि नागरिक कागज scan करके portal पर upload कर सके।

एक प्रभावी cooperative registration system में ideally applicant को यह पता होना चाहिए कि आवेदन किस अधिकारी के पास है, कौन-सा document अधूरा है, objection क्या है और decision की expected timeline कितनी है। Certificate, registered bye-laws और approval history भी digital form में उपलब्ध हों तो आगे audit, banking और departmental verification आसान हो सकती है।

सहकारी क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि registration के बाद संस्था का संबंध Registrar, banks, tax authorities, federations और कई मामलों में procurement या marketing agencies से बनता है। शुरुआत से सही digital record आगे के compliance burden को काफी कम कर सकता है।

सहकारिता में अब गठन के साथ कारोबार पर भी जोर

असम का यह कदम सहकारी क्षेत्र में चल रहे एक बड़े बदलाव से भी जुड़ता दिखाई देता है। आज चर्चा केवल नई संस्था के पंजीकरण तक सीमित नहीं है; सवाल यह भी है कि registration के बाद वह संस्था आर्थिक रूप से कितनी टिकाऊ बनती है।

इसी संदर्भ में हाल ही में NAFED ने FPOs और खरीदारों के बीच सीधे व्यावसायिक संपर्क बढ़ाने के लिए FPO BizConnect आयोजित किया था। Sahakar Watch ने अपनी पिछली रिपोर्ट “NAFED का FPO BizConnect: FPOs को खरीदारों से जोड़ने की पहल” में विस्तार से बताया था कि किसान संगठनों के लिए registration या formation के बाद market linkage क्यों अगली बड़ी चुनौती है।

दोनों घटनाएं अलग राज्यों और संस्थाओं से संबंधित हैं, लेकिन संदेश एक ही दिशा में जाता है—संस्था बनाना आसान हो और बनने के बाद उसके लिए कारोबार करना भी आसान हो।

Registration reforms तभी ज्यादा उपयोगी होंगे जब नई cooperative societies को accounting, governance, market linkage, professional management और statutory compliance में भी समय पर सहायता मिल सके।

अन्य राज्यों के लिए भी देखने योग्य मॉडल

भारत में cooperative societies का registration मुख्य रूप से संबंधित राज्य के cooperative law और Registrar के प्रशासनिक ढांचे के तहत होता है। इसलिए राज्यों के बीच procedure और digitisation का स्तर अलग-अलग है। Ministry of Cooperation की राज्यवार सूची भी अलग-अलग Registrar portals की ओर संकेत करती है; हरियाणा सहित कई राज्यों में पहले से online cooperative portals मौजूद हैं।

इस कारण असम की घोषणा का मूल्य केवल असम तक सीमित नहीं है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि एक दिन और 30 दिन की घोषित timelines वास्तविक applications में किस हद तक कायम रहती हैं

इसके लिए आने वाले महीनों में कुछ आंकड़े देखने लायक होंगे—कितने आवेदन online आए, औसत processing time कितना रहा, कितने applications objections के कारण वापस हुए और dairy cooperatives को वास्तव में कितने समय में certificate मिला।

अभी implementation पर नजर रखना जरूरी

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। सरकार ने fully online registration और नई timelines की घोषणा कर दी है, लेकिन असम सरकार की कुछ मौजूदा official dairy webpages 27 अगस्त 2026 तक पुराने workflow को अब भी offline service के रूप में दिखा रही थीं। इसका अर्थ यह हो सकता है कि नीति का निर्णय हो चुका है लेकिन सभी departmental webpages, forms और प्रक्रियाओं को नई व्यवस्था के अनुरूप update करने का काम अभी जारी है।

इसलिए किसी prospective cooperative को केवल समाचार के आधार पर यह मानकर आवेदन प्रक्रिया शुरू नहीं करनी चाहिए कि हर जिले में नया one-day/30-day workflow उसी समय operational हो चुका है। संबंधित Registrar या अधिकृत portal पर लागू प्रक्रिया की पुष्टि करना उचित रहेगा।

फिर भी, दिशा महत्वपूर्ण है। सहकारी संस्थाओं को genuinely member-owned enterprise के रूप में बढ़ाना है तो registration को अनावश्यक paperwork से मुक्त करना, transparent timeline देना और बाद की compliance को digital बनाना जरूरी है।

असम का प्रयोग यदि घोषित समयसीमा और उचित scrutiny के साथ सफल होता है तो यह दूसरे राज्यों के लिए भी एक उपयोगी administrative case study बन सकता है।

संबंधित लेख

नई पोस्ट सीधे अपने ईमेल इनबॉक्स में पाने के लिए यहाँ सदस्यता लें।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *