
HAFED धान खरीद कमीशन मुद्दा: सहकारी विपणन समितियों की मांग पर फिर तेज हुई कार्रवाई
चंडीगढ़/सिरसा। हरियाणा में HAFED के माध्यम से धान और गेहूं की सरकारी खरीद में काम करने वाली सहकारी विपणन समितियों के कमीशन का मामला एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से गेहूं खरीद पर मिलने वाले कमीशन में बढ़ोतरी की मांग कर रही समितियों का विवाद तब और गहरा गया था, जब सितंबर 2025 में धान खरीद पर पहले से मिल रही लगभग ₹5.80 प्रति क्विंटल की दर को घटाकर ₹1.33 प्रति क्विंटल कर दिया गया। इसके बाद प्रदेशभर में विरोध, धरने और हड़ताल तक की स्थिति बनी।
अब अगस्त 2026 में यह मुद्दा फिर उच्च स्तर तक पहुंचा है।
यूनियन द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, 25 अगस्त 2026 को विभिन्न सहकारी विपणन समितियों के कर्मचारियों, समिति अध्यक्षों और निदेशकों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मिला। इसके बाद हरियाणा पंचायत भवन में HAFED के प्रबंध निदेशक के साथ भी इस विषय पर वार्ता हुई। अगले दिन, 26 अगस्त को HAFED के Board of Administrators की बैठक के दौरान भी यूनियन प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया गया और मामले पर सकारात्मक समाधान का भरोसा दिया गया।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल कर्मचारियों के वेतन या किसी एक समिति की आय का विवाद नहीं है। सवाल यह है कि जिन cooperative marketing societies से मंडी स्तर पर खरीद, किसानों के साथ समन्वय, रिकॉर्ड, स्टॉक और दूसरी operational जिम्मेदारियां निभाई जाती हैं, क्या उनके लिए तय कमीशन उस वास्तविक लागत के अनुरूप है जो उन्हें यह काम करने में उठानी पड़ती है।
विवाद की जड़: मांग बढ़ोतरी की थी, धान का कमीशन घट गया
इस विवाद की पृष्ठभूमि सितंबर 2025 तक जाती है।
The Tribune की 11 अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार HAFED के 29 सितंबर 2025 के निर्देश में धान खरीद का कमीशन ₹5.80 प्रति क्विंटल से घटाकर ₹1.33 प्रति क्विंटल कर दिया गया था। पहले धान पर कमीशन MSP का 0.25 प्रतिशत था। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में HAFED से जुड़ी लगभग 69 cooperative marketing societies खरीद कार्य के साथ बीज और उर्वरक जैसी गतिविधियां भी करती थीं।
विडंबना यह थी कि समितियों की मूल मांग गेहूं खरीद पर लंबे समय से मिल रहे ₹1.33 प्रति क्विंटल कमीशन को बढ़ाने की थी। लेकिन बढ़ोतरी के बजाय धान की बेहतर दर भी घटाकर उसी स्तर पर लाए जाने से असंतोष बढ़ गया।
अमर उजाला ने भी उस समय बताया था कि गेहूं पर समितियों को ₹1.33 प्रति क्विंटल और धान पर MSP का 0.25 प्रतिशत, यानी करीब ₹5.80 प्रति क्विंटल मिल रहा था। कटौती के बाद कई जिलों में समिति कर्मचारियों ने धरना शुरू किया।
सिरसा सहित दूसरे जिलों में विरोध के दौरान समितियों ने केवल धान की पुरानी दर बहाल करने की मांग नहीं रखी, बल्कि गेहूं कमीशन बढ़ाने, fertiliser quota और अन्य सेवा शुल्क से संबंधित मुद्दे भी उठाए।
2025 में आंदोलन के बाद मामला शांत हुआ, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ
अक्टूबर 2025 के आंदोलन का असर भी दिखाई दिया। फतेहाबाद से प्रकाशित रिपोर्ट में 11 अक्टूबर को दो दिन का सांकेतिक धरना समाप्त होने और कमीशन विवाद पर बातचीत के बाद समाधान की दिशा बनने का उल्लेख किया गया था। यूनियन ने उसी दौर में सहकारी विपणन समितियों की वित्तीय स्वायत्तता तथा HAFED की निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी की मांग भी उठाई थी।
यही पुराना रिकॉर्ड वर्तमान विवाद को महत्वपूर्ण बनाता है।
यदि किसी दर को लेकर 2025 में इतना बड़ा विरोध हुआ, समझौते की स्थिति बनी और बाद में वही आर्थिक प्रश्न दोबारा सामने आया, तो अब केवल अस्थायी समाधान की बजाय लिखित और स्पष्ट commission policy की आवश्यकता अधिक महसूस होती है।
समितियों को पहले से पता होना चाहिए कि गेहूं, धान या दूसरी फसल की खरीद में उन्हें किस आधार पर कितना भुगतान मिलेगा और उस दर की समीक्षा कब होगी।
मार्च 2026 में केंद्र ने भी procurement commission बढ़ाया
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है।
भारत सरकार के Consumer Affairs, Food & Public Distribution Ministry ने मार्च 2026 में सरकारी खरीद से जुड़े arthiyas और cooperative societies की commission rates में संशोधन की घोषणा की। PIB के अनुसार cooperative societies के लिए गेहूं खरीद की दर ₹27 से बढ़ाकर ₹29.79 प्रति क्विंटल और धान के लिए ₹32 से बढ़ाकर ₹35.30 प्रति क्विंटल की गई। ये संशोधित दरें RMS 2026-27 से प्रभावी बताई गई हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
केंद्र की यह दर सरकारी procurement framework में cooperative societies को देय commission से संबंधित है, जबकि हरियाणा में चल रहा मौजूदा विवाद HAFED और उसकी member cooperative marketing societies के बीच actual operational payment structure से जुड़ा है। दोनों व्यवस्थाओं का accounting और reimbursement mechanism किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़ता है, इस पर HAFED या Haryana Government की स्पष्ट लिखित स्थिति सामने आना उपयोगी होगा।
यह बिंदु भविष्य की नीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर procurement agencies को दी जाने वाली दरें लागत के अनुसार revise की जाती हैं, तो मंडी स्तर पर वास्तविक कार्य करने वाली primary/member cooperative societies की लागत का भी समय-समय पर स्वतंत्र assessment होना चाहिए।
₹1.33 का सवाल केवल रकम का नहीं
किसी दर को देखकर पहली नजर में अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन बड़े procurement volume पर इसका असर काफी बढ़ जाता है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी cooperative society के माध्यम से एक लाख क्विंटल धान खरीदा जाता है, तो:
₹1.33 प्रति क्विंटल की दर पर कुल कमीशन लगभग ₹1.33 लाख होगा।
₹5.80 की पुरानी दर पर वही राशि लगभग ₹5.80 लाख होती।
यानी केवल इस उदाहरण में अंतर लगभग ₹4.47 लाख बैठता है।
इसी आय से समिति को कर्मचारी, स्टेशनरी, रिकॉर्ड प्रबंधन, कार्यालय, स्थानीय operational व्यवस्था और दूसरे administrative खर्च पूरे करने पड़ सकते हैं। इसलिए यूनियन का तर्क इसे सिर्फ दर का विवाद न मानकर societies की financial viability से जोड़ता है।
यहां PACS और cooperative reform की बड़ी बहस भी जुड़ती है
हरियाणा में अभी व्यापक स्तर पर cooperative institutions को अधिक professional, transparent और financially viable बनाने की चर्चा चल रही है। हाल में PACS को मजबूत करने, technology adoption बढ़ाने और rural cooperative structure को अधिक परिणामोन्मुख बनाने पर भी विचार हुआ है।
लेकिन किसी cooperative institution को मजबूत बनाने की नीति तभी व्यवहारिक होगी जब उसे दिए जाने वाले सरकारी या federation-related कार्यों का पर्याप्त remuneration भी मिले।
Sahakar Watch ने अपनी NAFED FPO BizConnect रिपोर्ट में भी इसी बुनियादी प्रश्न को उठाया था—किसी किसान संस्था या cooperative structure का गठन ही पर्याप्त नहीं; उसके लिए sustainable business model और revenue stream भी आवश्यक हैं।
इसी तरह असम में cooperative registration को digital बनाने पर हमारी रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि आसान registration पहला चरण है; संस्था को आगे professional तरीके से चलाने के लिए governance और financial sustainability equally important हैं।
इन दोनों पुरानी रिपोर्टों को इस HAFED लेख में contextual internal links के रूप में जोड़ना उचित रहेगा।
अब सबसे महत्वपूर्ण क्या होगा?
25 और 26 अगस्त की वार्ताओं के बाद अब नजर मौखिक आश्वासन से आगे लिखित निर्णय पर रहेगी।
तीन बातें विशेष रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।
पहली—धान खरीद में HAFED member societies को अंतिम रूप से कितनी commission rate मिलेगी।
दूसरी—गेहूं खरीद की लंबे समय से चली आ रही ₹1.33 प्रति क्विंटल वाली दर का पुनरीक्षण होगा या नहीं।
तीसरी—भविष्य में commission fixation के लिए कोई transparent formula बनेगा या हर बार season शुरू होने से पहले इसी तरह विवाद की स्थिति पैदा होगी।
एक स्थायी व्यवस्था में actual cost, procurement volume, MSP और societies द्वारा निभाई जाने वाली responsibilities को आधार बनाकर periodic revision का प्रावधान अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
सहकारिता का मूल विचार सदस्य-आधारित संस्थाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। यदि प्राथमिक और marketing cooperative societies लगातार घाटे वाले सरकारी कार्यों पर निर्भर रहेंगी, तो उनसे मजबूत governance, professional staff और बेहतर service delivery की अपेक्षा करना कठिन होगा।
इसलिए मौजूदा HAFED commission dispute का समाधान केवल एक खरीद सीजन का हिसाब नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि हरियाणा अपनी cooperative marketing societies को केवल procurement machinery के रूप में देखता है या financially sustainable member institutions के रूप में विकसित करना चाहता है।
अगला ठोस कदम अब सरकारी रिकॉर्ड में दिखाई देना चाहिए।
