
National Cooperation Policy अब गांव तक कैसे पहुंचेगी? पहली इम्प्लीमेंटेशन कमेटी बैठक में तय हुआ रोडमैप
किसी भी नई नीति के एलान होने और असल में जमीन पर उतरने के बीच अक्सर एक बड़ा फासला होता है। पिछले साल जारी हुई नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति (National Cooperation Policy 2025) के साथ भी यही सवाल था — कागज पर लिखे लक्ष्य गांव के किसी PACS दफ्तर या दूध सहकारी समिति तक कैसे पहुंचेंगे। इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए बनाई गई मॉनिटरिंग व इम्प्लीमेंटेशन कमेटी की पहली बड़ी बैठक 9 जून 2026 को हुई, जिसकी अध्यक्षता नीति आयोग की पूर्व सलाहकार डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने की। इस बैठक में नीति को अमल में लाने का विस्तृत रोडमैप तय किया गया, और यही वजह है कि यह विषय अभी सहकारिता जगत में सबसे ज्यादा चर्चा में है।
नई नीति को छह मुख्य स्तंभों (pillars) के आधार पर बांटा गया है, जिनमें सहकारी ढांचे को मजबूत करना, कानूनी व नियामक सुधार, वित्तीय समावेशन बढ़ाना, तकनीक व डेटा का इस्तेमाल, मानव संसाधन विकास और नई पीढ़ी के सहकारी मॉडल को बढ़ावा देना शामिल है। बैठक में हर स्तंभ के लिए अलग समयसीमा और जिम्मेदार एजेंसी तय करने पर जोर दिया गया, ताकि नीति सिर्फ एक दस्तावेज बनकर न रह जाए।
सबसे व्यावहारिक फैसला शायद यह रहा कि गांव की प्रारंभिक कृषि साख समितियों यानी PACS को सिर्फ कर्ज देने वाली संस्था से आगे बढ़ाकर “बहुउद्देश्यीय केंद्र” (multipurpose centre) बनाने की योजना पर काम तेज होगा — यानी वही समिति खाद-बीज बेचे, गोदाम की सुविधा दे, बीमा और बैंकिंग सेवाएं दे, और डिजिटल सेवा केंद्र की तरह भी काम करे। इसके साथ ही हर जिले में कम से कम एक “मॉडल कोऑपरेटिव विलेज” विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा गया, जिसे बाकी गांवों के लिए नमूने के तौर पर पेश किया जाएगा — यानी वहां जाकर देखा जा सके कि सहकारी मॉडल पूरी तरह लागू होने पर गांव की तस्वीर कैसी दिखती है।
तकनीक के मोर्चे पर बैठक में एक साझा ERP प्रणाली और मजबूत डेटा गवर्नेंस ढांचे पर सहमति बनी, जिससे देश की सभी सहकारी समितियों की जानकारी एक जगह — राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस — में उपलब्ध हो सके। अभी हाल यह है कि किसी समिति की सही स्थिति जानने के लिए राज्य सहकारी विभागों के अलग-अलग रिकॉर्ड खंगालने पड़ते हैं; नई व्यवस्था लागू होने पर यह जानकारी एक क्लिक में मिल सकेगी, जिससे नीति बनाने और निगरानी दोनों में आसानी होगी।
मानव संसाधन के मोर्चे पर सबसे बड़ी घोषणा त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (Tribhuvan Sahkari University) से जुड़ी है, जिसका मकसद सहकारिता क्षेत्र के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करना है — प्रबंधन से लेकर ऑडिट और तकनीकी कामकाज तक। अभी ज्यादातर समितियों में स्टाफ के पास सहकारिता प्रबंधन की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं होती, जिसका असर उनके कामकाज पर दिखता है। इसके अलावा निर्यात, जैविक उत्पाद और बीज क्षेत्र के लिए बनाई गई नई राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं (जैसे सहकारी निर्यात संस्था) के काम को भी और तेज करने पर चर्चा हुई, ताकि छोटे किसानों की उपज को सीधे बड़े और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा सके।
बैठक में सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य के तौर पर सामने आया — 2035 तक सहकारी समितियों की सदस्यता को मौजूदा करीब 32 करोड़ से बढ़ाकर 50 करोड़ तक ले जाना। “सहकार से समृद्धि” और “विकसित भारत @2047” जैसे नारों के तहत इसे एक बड़े राष्ट्रीय अभियान की शक्ल दी जा रही है।
बेशक इतने बड़े लक्ष्य को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। नीति और बैठकों में तय रोडमैप एक बात है, राज्यों के सहकारी विभागों तक इसे उतारना और हर PACS के स्तर पर अमल में लाना बिल्कुल दूसरी बात। कई राज्यों में सहकारी विभाग पहले से स्टाफ और बजट की कमी से जूझ रहे हैं, और कोई भी नई व्यवस्था तभी टिकेगी जब जमीनी स्तर पर संसाधन भी उसी अनुपात में पहुंचें। फिर भी, इतने स्पष्ट स्तंभों, समयसीमा और एक केंद्रीय निगरानी तंत्र के साथ आगे बढ़ना यह जरूर बताता है कि इस बार नीति को सिर्फ घोषणा तक सीमित नहीं रखा जा रहा — आने वाले महीनों की मॉनिटरिंग बैठकें ही बताएंगी कि यह रफ्तार बनी रहती है या नहीं।
(यह लेख सहकारिता मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और जून 2026 में हुई इम्प्लीमेंटेशन मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक की सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है।)
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