
सहकारिता मंत्रालय के 5 साल: छोटे से गांव तक पहुंची सहकारिता की नई ताकत
6 जुलाई 2021 का दिन भारत की सहकारिता व्यवस्था के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ, जब केंद्र सरकार ने पहली बार देश में अलग से “सहकारिता मंत्रालय” बनाया। इससे पहले सहकारी समितियों से जुड़ा कामकाज कृषि मंत्रालय के भीतर ही एक छोटे-से विभाग के तौर पर चलता था, और अलग-अलग राज्यों की सहकारी संस्थाओं के बीच तालमेल का कोई साझा ढांचा नहीं था। जुलाई 2026 में इस मंत्रालय ने अपनी स्थापना के पांच साल पूरे किए, और इस मौके पर मंत्रालय की तरफ से बीते पांच साल के कामकाज का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया गया। आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि इन पांच सालों में गांव-गांव तक फैले सहकारी ढांचे में काफी कुछ बदला है — भले ही यह बदलाव हर जगह एक जैसी रफ्तार से न पहुंचा हो.
देश में करीब 8.58 लाख सहकारी समितियां हैं, जिनसे किसी न किसी रूप में लगभग 32 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं — यानी मोटे तौर पर हर चौथा भारतीय किसी सहकारी संस्था का सदस्य है। दिलचस्प बात यह है कि इतने बड़े नेटवर्क का अब तक कोई एक साझा डेटाबेस मौजूद नहीं था — किस राज्य में कौन-सी समिति चल रही है, कौन-सी बंद पड़ी है, किसकी माली हालत कैसी है, इसका हिसाब बिखरा हुआ था। मंत्रालय ने पिछले पांच साल में इन सभी समितियों को एक राष्ट्रीय डेटाबेस में लाने का काम शुरू किया, ताकि नीति बनाते वक्त अंदाजे की बजाय असली आंकड़ों के आधार पर फैसले हो सकें।
सबसे बड़ा बदलाव शायद गांव के सबसे पुराने सहकारी ढांचे — प्रारंभिक कृषि साख समिति यानी PACS — के डिजिटलीकरण में दिखा। मंत्रालय के मुताबिक 55,000 से ज्यादा PACS को कंप्यूटरीकृत किया जा चुका है और इन्हें एक साझा सॉफ्टवेयर के जरिए राज्य सहकारी बैंकों और नाबार्ड से सीधे जोड़ दिया गया है। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि अब हिसाब-किताब में हेरफेर की गुंजाइश कम हुई है और किसान को कर्ज मंजूर होने में लगने वाला समय भी घटा है। कंप्यूटरीकरण के बाद इन समितियों को सिर्फ कर्ज बांटने वाली इकाई बने रहने देने की बजाय, इनमें 300 से ज्यादा तरह की अतिरिक्त सुविधाएं जोड़ी गईं — जैसे बिजली-पानी का बिल जमा करना, बीमा से जुड़े काम, रेल टिकट बुकिंग, आधार से जुड़ी सेवाएं। मतलब जो सुविधाएं पहले सिर्फ शहर के कॉमन सर्विस सेंटर पर मिलती थीं, वे अब गांव की अपनी समिति के दफ्तर में भी मिलने लगी हैं।
इसी कड़ी में करीब 39,000 PACS को “किसान समृद्धि केंद्र” के रूप में बदला गया है, जहां किसानों को खाद-बीज के अलावा मिट्टी जांच, कृषि यंत्र किराए पर लेने और सरकारी योजनाओं की जानकारी एक ही जगह मिल जाती है — बार-बार अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर काटने की जरूरत कम हुई है। वहीं 600 से ज्यादा PACS पर जन औषधि केंद्र भी खोले गए हैं, जहां सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलती हैं। यह कदम खासकर उन इलाकों के लिए राहत की बात है जहां नजदीक कोई भरोसेमंद मेडिकल स्टोर नहीं है और दवा के लिए कस्बे तक जाना पड़ता है।
पांच साल पूरे होने के मौके पर मंत्रालय ने समितियों के कामकाज को परखने के लिए एक नया राष्ट्रीय रैंकिंग ढांचा भी सामने रखा है। इसमें समितियों को उनकी वित्तीय सेहत, दी जा रही सेवाओं की संख्या और सदस्यों की सक्रिय भागीदारी जैसे पैमानों पर परखा जाएगा। सोच यह है कि अच्छा काम करने वाली समितियों को पहचान मिले, कमजोर समितियों के लिए एक बेंचमार्क तैयार हो, और राज्य सरकारें भी अपने यहां की समितियों की तुलना दूसरे राज्यों से कर सकें।
मंत्रालय के अपने आकलन के अनुसार, इन पांच सालों में करीब 30 करोड़ लोगों तक इन योजनाओं का फायदा किसी न किसी रूप में पहुंचा है। जाहिर है यह आंकड़ा सरकार का अपना दावा है, और जमीनी हकीकत हर जगह एक जैसी नहीं होगी — कई PACS आज भी सिर्फ कागजों पर सक्रिय दिखती हैं, वहां असल में कोई कामकाज नहीं होता। लेकिन दिशा साफ नजर आती है: सहकारी समितियों को महज कर्ज देने वाली संस्था से आगे बढ़ाकर गांव के रोजमर्रा के कामकाज का एक केंद्र बनाने की कोशिश हो रही है। आने वाले सालों में असली कसौटी यही होगी कि जिन समितियों को कंप्यूटरीकृत कर दिया गया है, वे वाकई कितनी सक्रिय रहती हैं, और नई सेवाएं गांव के आम सदस्य तक कितनी आसानी और पारदर्शिता से पहुंचती हैं।
(यह लेख सहकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जुलाई 2026 में मंत्रालय की स्थापना के 5 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जारी आधिकारिक आंकड़ों और जानकारी पर आधारित है।)
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