कानून की किताब में CM-PACS रजिस्ट्रेशन की तस्वीर साफ दिखती है — आवेदन दो महीने में निपटना चाहिए, बाय-लॉज़ पहले से तैयार मिलते हैं। लेकिन जमीन पर सवाल दो हैं जिनका जवाब कोई एक लाइन में नहीं देता: असल में समय कितना लगता है, और इसमें खर्च कितना आता है। हमने रजिस्ट्रेशन की कानूनी प्रक्रिया पर पिछली पोस्ट में बात की थी — यहां उसी सवाल को व्यावहारिक नज़रिए से देखते हैं।
कानूनी समय-सीमा बनाम असली रफ्तार
अधिनियम की धारा 8 रजिस्ट्रार को आवेदन मिलने की तारीख से दो महीने के भीतर फैसला लेने के लिए बाध्य करती है। लेकिन हरियाणा सरकार के अपने आंकड़े इस तस्वीर को थोड़ा जटिल बनाते हैं। जुलाई 2025 में सरकार ने राज्य में 500 CM-PACS बनाने का लक्ष्य रखा था, और उस वक्त तक सिर्फ 141 ही बन पाई थीं — यह पूरा संदर्भ हमारी 804 में सिर्फ 33 PACS मुनाफे में वाली पड़ताल में मिलेगा। दो महीने की कानूनी समय-सीमा किसी एक आवेदन पर लागू होती है, लेकिन पूरे राज्य में सैकड़ों नई समितियां बनाने की रफ्तार कहीं धीमी रही।
असल में देरी कहां होती है
ज़्यादातर देरी कानून की वजह से नहीं, बल्कि प्रक्रिया के व्यावहारिक हिस्सों में होती है। इंस्पेक्टर का फील्ड वेरिफिकेशन शेड्यूल होने में समय लगता है, खासकर दूर-दराज़ के गांवों में। कई बार आवेदन में कमी रह जाने पर — जैसे दस्तावेज़ अधूरे होना या हस्ताक्षर मेल न खाना — पूरी फाइल वापस आवेदकों के पास लौटती है, जिससे प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती है। इसके अलावा गांव या पंचायत-क्लस्टर के स्तर पर कार्यक्षेत्र और प्रबंधन समिति के सदस्यों पर आपसी सहमति बनाने में भी समय लगता है, और यह हिस्सा कानून के दायरे से बाहर, पूरी तरह स्थानीय स्तर पर तय होता है।
फीस को लेकर पारदर्शिता की कमी
हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 में रजिस्ट्रेशन के लिए कोई निश्चित फीस राशि खुद नियमों में दर्ज नहीं है। नियम 80 ऑडिट फीस और नियम 82 विवाद-निपटान फीस के बारे में जो भाषा इस्तेमाल करते हैं, वह एक जैसी है — फीस “समय-समय पर रजिस्ट्रार द्वारा, सरकार की मंज़ूरी से तय किए गए स्तर के मुताबिक” ली जाएगी। यानी रजिस्ट्रेशन से जुड़ी फीस भी नियमों की किताब में खुद नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार के अलग से जारी आदेशों में तय होती है। इसका मतलब है कि सही और मौजूदा फीस जानने का सबसे भरोसेमंद तरीका है अपने इलाके के सहायक रजिस्ट्रार (ARCS) कार्यालय से सीधे पता करना — इंटरनेट पर मिलने वाला कोई भी पुराना आंकड़ा भरोसे लायक नहीं माना जाना चाहिए।
असली खर्च जो पक्के तौर पर पता है
सरकारी रजिस्ट्रेशन फीस भले अस्पष्ट हो, लेकिन सदस्यों की अपनी जेब से जो पैसा लगता है, वह मॉडल बाय-लॉज़ में साफ दर्ज है। हमारे CM-PACS क्या है? वाले लेख में बताया गया था कि हर सदस्य को मंज़ूरी के बाद ₹1,000 प्रवेश शुल्क (non-refundable) और ₹1,000 के एक शेयर की रकम जमा करनी होती है। CM-PACS के लिए हरियाणा सहकारिता विभाग ने न्यूनतम 11 सदस्य अनिवार्य किए हैं, यानी सिर्फ सदस्यता की शुरुआती पूंजी ही करीब ₹22,000 (11 × ₹2,000) बैठती है — इसके ऊपर सरकारी फीस, स्टाम्प पेपर और दस्तावेज़ीकरण का खर्च अलग से जुड़ता है।
व्यावहारिक सलाह
अगर आपका समूह CM-PACS रजिस्टर कराने की सोच रहा है, तो दो महीने की कानूनी समय-सीमा को न्यूनतम मानकर चलें, अधिकतम नहीं। दस्तावेज़ पहले से पूरी तरह तैयार रखना — जिसकी चेकलिस्ट हमने पिछली पोस्ट में दी थी — देरी की सबसे बड़ी वजहों में से एक को शुरुआत में ही खत्म कर देता है। और फीस की सही जानकारी के लिए ऑनलाइन खोजने की बजाय सीधे ARCS कार्यालय जाना ज़्यादा भरोसेमंद रास्ता है।
स्रोत सूची (Source List)
- हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 — धारा 8
- हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 — नियम 80, 82
- Sahakar Watch — हरियाणा में CM-PACS और नई सुविधाओं की घोषणाएं, 804 में से सिर्फ 33 PACS मुनाफे में
- Sahakar Watch — CM-PACS क्या है?
- Sahakar Watch — हरियाणा में CM-PACS रजिस्टर कैसे करें?
- Sahakar Watch — CM-PACS रजिस्ट्रेशन से पहले ये 10 चीज़ें तैयार रखें
- Dainik Tribune — प्रदेश में बनेंगी 500 CM-PACS (न्यूनतम 11 सदस्य अनिवार्य)











