मान लीजिए किसी गांव की CM-PACS ने साल भर में अच्छा मुनाफा कमाया — खाद-बीज की बिक्री से, डेयरी कलेक्शन से, या फेयर प्राइस शॉप से। सवाल उठता है: क्या यह पूरा पैसा सदस्यों में बांटा जा सकता है? कानून का जवाब साफ “नहीं” है। हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम और नियम हर सोसाइटी को अपने मुनाफे का एक तय हिस्सा हर साल रिज़र्व फंड में डालना अनिवार्य करते हैं, इससे पहले कि बाकी पैसे पर कोई और फैसला लिया जाए।
कितना हिस्सा रिज़र्व फंड में जाना ज़रूरी है
हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 का नियम 74 अधिनियम की धारा 87 के तहत यह तय करता है कि हर सोसाइटी को अपने नेट प्रॉफिट (net profit) का कम से कम दसवां हिस्सा (one-tenth, यानी करीब 10%) रिज़र्व फंड में डालना ज़रूरी है। रजिस्ट्रार चाहे तो सामान्य या विशेष आदेश जारी कर इस अनुपात को बढ़ा भी सकता है — लेकिन यह चौथाई हिस्से (one-fourth, यानी 25%) से ज़्यादा नहीं हो सकता। यानी कानून एक न्यूनतम सीमा तय करता है और रजिस्ट्रार को इसे 10% से 25% के बीच बढ़ाने का अधिकार देता है, घटाने का नहीं। “नेट प्रॉफिट” की परिभाषा भी अधिनियम की धारा 2(l) में साफ दी गई है — यह वह मुनाफा है जो स्थापना खर्च (establishment charges), आकस्मिक खर्च, कर्ज़-जमा पर देय ब्याज, ऑडिट फीस और ऐसी ही अन्य निर्धारित राशियां घटाने के बाद बचता है।
रिज़र्व फंड को सदस्यों में बांटा नहीं जा सकता
नियम 74(2) एक बहुत अहम बात साफ करता है — रिज़र्व फंड “अविभाज्य” (indivisible) होता है, यानी कोई भी सदस्य यह दावा नहीं कर सकता कि इसमें उसका कोई तय हिस्सा है। यह सदस्यों की व्यक्तिगत जमा-पूंजी (जैसे ₹1,000 एंट्री फीस और ₹1,000 प्रति शेयर, जो रजिस्ट्रेशन के वक्त जमा होती है) से बिल्कुल अलग चीज़ है — शेयर पूंजी सदस्य की अपनी होती है, जबकि रिज़र्व फंड पूरी सोसाइटी की सामूहिक सुरक्षा-पूंजी होता है, जिस पर किसी एक सदस्य का दावा नहीं बनता। हालांकि, नियम में एक अपवाद भी है — असाधारण परिस्थितियों में, और रजिस्ट्रार की पहले से मंज़ूरी लेकर, इस फंड का इस्तेमाल सोसाइटी के नुकसान की भरपाई के लिए किया जा सकता है। यानी यह पैसा पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन इसे निकालने का फैसला सोसाइटी की प्रबंध समिति अकेले नहीं ले सकती।
निवेशित रिज़र्व फंड को छेड़ा नहीं जा सकता
नियम 74(3) एक और सुरक्षा जोड़ता है — अगर सोसाइटी ने अपना रिज़र्व फंड अलग से किसी जगह निवेश किया है या जमा कराया है, तो वह उस निवेशित रकम को न तो निकाल सकती है, न उसे गिरवी रख सकती है, न ही किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल कर सकती है। इसका मकसद यही है कि रिज़र्व फंड सिर्फ कागज़ पर मौजूद न रहे, बल्कि वाकई एक सुरक्षित, अलग रखी गई पूंजी बना रहे जो सोसाइटी को मुश्किल वक्त में सहारा दे सके।
CM-PACS के लिए इसका व्यावहारिक मतलब
चूंकि CM-PACS एक साथ कई तरह का कारोबार कर सकती है — खाद-बीज से लेकर LPG और डेयरी तक — इसलिए साल के अंत में जब भी मुनाफे का हिसाब बैठे, प्रबंध समिति को सबसे पहले नियम 74 के मुताबिक तय हिस्सा रिज़र्व फंड में डालना होगा, उसके बाद ही बाकी मुनाफे पर कोई और फैसला — जैसे नई गतिविधि में निवेश या भविष्य की योजना — लिया जा सकता है। यह नियम न मानने पर सोसाइटी की सालाना ऑडिट और रजिस्ट्रार की जांच में आपत्ति उठ सकती है।
अगर सोसाइटी को नुकसान हो तो
अगर किसी साल CM-PACS को घाटा होता है, तो प्रबंध समिति सीधे रिज़र्व फंड से पैसा निकालकर घाटा पूरा नहीं कर सकती। इसके लिए पहले रजिस्ट्रार से मंज़ूरी लेनी होगी, और वह भी सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में। यह प्रावधान इसलिए है ताकि रिज़र्व फंड का इस्तेमाल सोच-समझकर, और बाहरी निगरानी के साथ ही हो, न कि हर छोटी-मोटी दिक्कत में इसे खर्च कर दिया जाए।
स्रोत सूची (Source List)
हरियाणा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1984 — धारा 87 (रिज़र्व फंड), धारा 2(l) (नेट प्रॉफिट की परिभाषा)
हरियाणा सहकारी सोसाइटी नियम, 1989 — नियम 74
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