तेलंगाना में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों यानी PACS के चुनाव को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई PACS की निर्वाचित समितियों का कार्यकाल खत्म हो चुका है, और चुनाव कराने के बजाय nominated committees यानी मनोनीत समितियां नियुक्त करने की तैयारी चल रही है।
इसी सिलसिले में BRS नेता और पूर्व DCCB उपाध्यक्ष Patnam Manikyam ने संगारेड्डी में प्रशासन को ज्ञापन देकर मांग की है कि PACS के चुनाव बिना देरी कराए जाएं। उनका कहना है कि मनोनयन सहकारी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा, और किसानों की भागीदारी के बिना कोई प्रबंधन असली मायने में प्रतिनिधि नहीं कहलाया जा सकता।
यह विवाद अकेले संगारेड्डी तक सीमित नहीं, इसकी जड़ें पिछले डेढ़ साल से चल रहे कार्यकाल विस्तार, सरकारी आदेशों और अदालती मामलों तक जाती हैं।
क्या है पूरा मामला?
Telangana Today की रिपोर्ट के अनुसार सोमवार (31 अगस्त 2026) को संगारेड्डी में जिला प्रशासन की प्रजा वाणी शिकायत सुनवाई के दौरान PACS सदस्यों और किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने, Manikyam के नेतृत्व में, अतिरिक्त कलेक्टर आर पांडु से मुलाकात की।
रिपोर्ट के मुताबिक Manikyam ने कहा कि “पदों पर मनोनयन व्यवस्था को बर्बाद कर देगा” और “जब तक किसानों को शामिल करके चुनाव नहीं कराया जाता, तब तक मनोनयन से कोई मकसद हल नहीं होगा।” उन्होंने सुझाव दिया कि कार्यकाल खत्म होने से करीब तीन महीने पहले ही चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी जानी चाहिए, ताकि बीच में मनोनयन की नौबत न आए। ज्ञापन में गुजरात का उदाहरण भी दिया गया, जहां रिपोर्ट के अनुसार सभी PACS के लिए चुनाव प्रक्रिया अब भी जारी है।
908 PACS और चुनाव में देरी का सवाल
Telangana Today की 31 अगस्त 2026 की रिपोर्ट में मनोनयन के दायरे में आने वाली PACS की संख्या 908 बताई गई है। इसी अखबार की एक अन्य रिपोर्ट (24 अप्रैल 2026) में यह आंकड़ा 980 PACS और 9 DCCB बताया गया, जिनमें करीब 12,000 पद मनोनयन से भरे जाने थे। दोनों आंकड़े एक ही अखबार की अलग-अलग रिपोर्टों से आए हैं, इसलिए सही संख्या स्पष्ट नहीं — यह किसी सरकारी अधिसूचना का नहीं, समाचार रिपोर्टिंग का आंकड़ा है।
रिपोर्टों के मुताबिक PACS समितियों का कार्यकाल फरवरी 2025 में समाप्त होना था, जिसे अगस्त 2025 और फिर फरवरी 2026 तक बढ़ाया गया। दिसंबर 2025 में भंग करने के आदेश जारी हुए, और अप्रैल 2026 में कैबिनेट ने मनोनीत निकाय बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
क्यों हो रहा है Nominated Committees का विरोध?
PACS जैसी सहकारी संस्थाएं सरकारी विभाग नहीं, सदस्यों के स्वामित्व वाली लोकतांत्रिक इकाइयां होती हैं। इनकी प्रबंधन समिति सदस्य किसानों के वोट से चुनी जाती है, जिससे समिति सीधे उन्हीं किसानों के प्रति जवाबदेह होती है। जब चुनाव की जगह प्रशासन किसी को मनोनीत करता है, तो आलोचकों के मुताबिक यह जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है — मनोनीत सदस्य को किसानों का समर्थन नहीं, प्रशासन का भरोसा चाहिए होता है।
BRS नेताओं का आरोप है कि मनोनयन का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से अनुकूल लोगों को पद देने के लिए हो रहा है। पूर्व कृषि मंत्री S Niranjan Reddy ने Telangana Today से कहा था, “कांग्रेस को PACS चुनावों में अपनी हार का अंदाजा है। मनोनयन का फैसला खुद को शर्मिंदगी से बचाने के लिए है।” यह एक राजनीतिक आरोप है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य नहीं। सरकार की तरफ से चुनाव खर्च बचाने की वजह भी रिपोर्ट हुई है। जानकारों का कहना है कि सदस्यों का मताधिकार सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता की बुनियाद है।
PACS चुनाव पर कानून क्या कहता है?
तेलंगाना में सहकारी समितियों का संचालन Telangana Co-operative Societies Act, 1964 के तहत होता है। धारा 34 समिति के “सुपरसेशन” यानी भंग किए जाने से जुड़े प्रावधान तय करती है, धारा 32 समिति व आम सभा की बैठकों से जुड़ी है, और धारा 123 रजिस्ट्रार को कुछ परिस्थितियों में समितियों को नियमों से छूट देने की शक्ति देती है। यह तीनों धाराएं हाल में एक अदालती मामले में केंद्र में रहीं।
Indian Cooperative के अनुसार सरकार ने 19 दिसंबर 2025 को एक आदेश से जिला कलेक्टरों को नौ DCCB के लिए “पर्सन-इन-चार्ज” नियुक्त किया था, जिसे प्रभावित सदस्यों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। मई 2026 में अदालत ने पाया कि सरकार भंग करने का “उचित और कानूनन टिकाऊ आधार” पेश नहीं कर पाई, और इसे धारा 32 व 123 का उल्लंघन बताते हुए रोक लगा दी। यह मामला मुख्यतः DCCB से जुड़ा है, PACS से सीधे नहीं, पर दोनों एक ही अधिनियम के तहत आते हैं और सवाल एक जैसा है।
Vaidyanathan Committee का संदर्भ कितना सही है?
Manikyam के ज्ञापन में Vaidyanathan Committee का हवाला दिया गया है। यह असल में केंद्र सरकार की “Task Force on Revival of Rural Co-operative Credit Institutions” थी, जिसकी अध्यक्षता अर्थशास्त्री ए वैद्यनाथन ने की, और जिसकी सिफारिशों पर सहकारी ऋण संरचना के लिए पुनरुद्धार पैकेज लागू हुआ था। भारत सरकार की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार इस पैकेज में “कानूनी और संस्थागत सुधार” शामिल थे ताकि समितियां “लोकतांत्रिक, आत्मनिर्भर और कुशल” तरीके से काम कर सकें।
यानी समिति का उद्देश्य सहकारी ढांचे को अधिक लोकतांत्रिक बनाना जरूर था, पर चुनाव की समय-सीमा जैसी किसी खास स्थिति पर समिति ने वास्तव में क्या लिखा, यह स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सका। इसलिए Manikyam का यह जोड़ना कि उनकी मांग समिति की भावना के अनुरूप है, एक व्याख्या के तौर पर लिया जाना चाहिए, शब्दशः सिफारिश के तौर पर नहीं।
यह मामला सिर्फ तेलंगाना तक सीमित क्यों नहीं है?
PACS विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल है: क्या प्राथमिक सहकारी समितियां सरकार की प्रशासनिक इकाई हैं, या सदस्य-स्वामित्व वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं? यह बहस अकेले तेलंगाना की नहीं — हाल में हरियाणा के झज्जर केंद्रीय सहकारी बैंक में निदेशकों के निलंबन का मामला भी इसी सवाल से जुड़ा था। दोनों राज्यों के कानून अलग हैं, इसलिए एक-से-एक तुलना उचित नहीं, पर अंतर्निहित सवाल एक जैसा है: सहकारी संस्थाओं में सरकारी हस्तक्षेप कहां तक जायज़ है।
आगे क्या हो सकता है?
आगे की राह कई दिशाओं में जा सकती है — रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ या राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण चुनावों की औपचारिक अधिसूचना जारी कर सकता है, मनोनीत व्यवस्था और बढ़ाई जा सकती है, PACS मनोनयन को भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है, या राजनीतिक दबाव में राज्यपाल स्तर पर हस्तक्षेप हो सकता है, जैसा मई 2026 में BRS प्रतिनिधिमंडल की राज्यपाल से मुलाकात के बाद देखने को मिला था। इन सबके बीच सबसे ज्यादा असर उन लाखों किसान सदस्यों पर पड़ता है, जिनका कर्ज, खाद-बीज और उपज बिक्री का कारोबार इन्हीं PACS से चलता है — उनके लिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि समिति में कौन बैठेगा, बल्कि यह भी है कि उनकी अपनी संस्था के फैसलों में उनकी आवाज़ शामिल होगी या नहीं।
निष्कर्ष
PACS जैसी सदस्य-आधारित संस्थाओं में समय पर चुनाव कराना इसलिए जरूरी माना जाता है क्योंकि यही एक तरीका है जिससे प्रबंधन सीधे सदस्य किसानों के प्रति जवाबदेह बना रहता है। जब चुनाव में लगातार देरी होती है और मनोनयन का सहारा लिया जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह अस्थायी मजबूरी है या स्थायी बदलाव की दिशा में कदम। फिलहाल PACS चुनावों का कोई औपचारिक कार्यक्रम सार्वजनिक नहीं हुआ है, जबकि जुड़ा DCCB मामला अदालत में विचाराधीन है — असली तस्वीर सरकार या रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ की आधिकारिक अधिसूचना से ही साफ होगी।
स्रोत
- Conduct elections to PACs without delay: BRS leader Manikyam — Telangana Today
- Congress moves to bypass cooperative elections, eyes nominated posts in PACS and DCCBs — Telangana Today
- Congress govt’s PACS nomination move raises concerns — Telangana Today
- Cooperative leaders oppose PACS dissolution, seek elections — Telangana Today
- BRS slams PACS nomination move as ‘undemocratic’ — The Hans India
- BRS urges Governor to stop PACS nominations, demands elections — The Rahnuma Daily
- Telangana HC Stays move to appoint Collectors as DCCB Administrators — Indian Cooperative
- Telangana HC directs DCCBs and PACS to resume their responsibilities — Hindudayashankar
- The Telangana Co-operative Societies Act, 1964 (Act No. 7 of 1964) — India Code
- State Cooperative Election Authority (SCEA) — Cooperation Department, Government of Telangana
- Revival of Cooperative Societies (Vaidyanathan Committee package) — Press Information Bureau, Government of India
नोट: यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, सरकारी दस्तावेज़ों और अदालती आदेशों के सार्वजनिक विवरण पर आधारित है। जहां किसी दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी, वहां उसे संबंधित पक्ष के बयान के तौर पर स्पष्ट रूप से बताया गया है। अंतिम और आधिकारिक स्थिति तेलंगाना सरकार अथवा रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ की अधिसूचना से ही स्पष्ट होगी।
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