अगर आपकी PACS या CM-PACS गोदाम बनाने या warehouse प्रोजेक्ट पर विचार कर रही है, तो 3 सितंबर 2026 को Press Information Bureau (PIB) ने जो नया implementation update जारी किया है, वह आपके लिए सीधे काम की चीज़ है। यह कोई नया कानून या घोषणा नहीं है — यह Ministry of Cooperation की Decentralised Grain Storage Plan का ताज़ा स्टेटस डेटा और उसका पूरा financing/viability गणित है, जो जुलाई 2026 तक की प्रगति के साथ सामने आया है। इसमें बताया गया है कि सब्सिडी, ब्याज दर और FCI की गारंटीड हायरिंग को मिलाकर एक PACS गोदाम बनाने की असल लागत कितनी घट जाती है, और कौन-सी समिति इसके लिए योग्य मानी जाती है।
इस लेख में हम इस अपडेट को हरियाणा और देशभर की PACS/CM-PACS के नज़रिए से पूरी तरह समझेंगे — योजना क्या है, नए आंकड़े क्या कहते हैं, फाइनेंसिंग मॉडल कैसे काम करता है, चयन प्रक्रिया क्या है, और सबसे ज़रूरी — इसका व्यावहारिक मतलब आपकी समिति के लिए क्या है।
एक नज़र में मुख्य आंकड़े
- चिन्हित PACS (जुलाई 2026 तक): 1,012
- गोदाम निर्माण पूर्ण: 313 PACS
- कुल भंडारण क्षमता तैयार: 1.80 लाख मीट्रिक टन से अधिक
- पायलट चरण की क्षमता (2023): 9,750 मीट्रिक टन, 11 राज्यों में
- AMI सब्सिडी: 25% से बढ़ाकर 33.33%
- मार्जिन मनी आवश्यकता: 20% से घटाकर 10%
- AIF ब्याज सबवेंशन: 3%
- प्रभावी ऋण लागत (योग्य PACS के लिए): लगभग 1%
- न्यूनतम लीज़ अवधि (यदि ज़मीन लीज़ पर हो): 20 वर्ष से अधिक
Decentralised Grain Storage Plan है क्या?
Decentralised Grain Storage Plan in Cooperative Sector को सहकारिता मंत्रालय ने 31 मई 2023 को एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मंज़ूरी दी थी। मक़सद सीधा था — अनाज भंडारण को बड़े केंद्रीय गोदामों तक सीमित न रखकर गांव के स्तर पर, यानी सीधे Primary Agricultural Credit Society (PACS) के पास ले जाना, ताकि किसान को फसल कटते ही औने-पौने दाम पर बेचने (distress sale) की मजबूरी न रहे, अनाज की बर्बादी घटे, और ट्रांसपोर्ट का खर्च बचे।
पायलट चरण में 11 राज्यों — महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, असम, कर्नाटक और त्रिपुरा — की PACS में कुल 9,750 मीट्रिक टन क्षमता के गोदाम बनाए गए। इसके बाद योजना को चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में फैलाया जाने लगा, जिसमें 50, 100 और 200 मीट्रिक टन क्षमता वाले silo-आधारित गोदाम शामिल किए गए। बड़ा लक्ष्य है — देशभर में 2 लाख multipurpose PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों को मज़बूत करना, जिसके लिए एक तय Standard Operating Procedure भी जारी की जा चुकी है।
3 सितंबर 2026 की अपडेट: जुलाई तक के आंकड़े
PIB की ताज़ा प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जुलाई 2026 तक देशभर में 1,012 PACS/सहकारी समितियां इस योजना के लिए चिन्हित की जा चुकी हैं। इनमें से 313 PACS में गोदाम निर्माण पूरा हो चुका है, जिससे 1.80 लाख मीट्रिक टन से अधिक भंडारण क्षमता तैयार हो गई है — यानी पायलट चरण के 9,750 मीट्रिक टन के मुक़ाबले क्षमता अब करीब 18 गुना बढ़ चुकी है।
यह प्रगति उस व्यापक तस्वीर का हिस्सा है जिसमें भारत का 2025-26 का कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.5 million टन अनुमानित है — पिछले साल के 357.7 million टन से 18.8 million टन (5.3%) ज़्यादा। National Food Security Act, 2013 के तहत करीब 80 करोड़ लोगों को अनाज मिलता है, तो इतने बड़े स्टॉक को संभालने के लिए विकेंद्रीकृत भंडारण ढांचा सरकार की प्राथमिकता में है।
हमारे पहले के विश्लेषण में हमने दिखाया था कि हरियाणा में मुनाफे वाली PACS की संख्या 33 से बढ़कर 51 हुई है और सभी 710 PACS का कम्प्यूटरीकरण पूरा हो चुका है — यानी बुनियादी ढांचा तैयार है। सवाल यह है कि क्या हरियाणा की PACS इस ताज़ा राष्ट्रीय भंडारण योजना का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं, यह हम आगे समझेंगे।
असली गेम-चेंजर: फाइनेंसिंग का गणित
इस अपडेट में सबसे ज़्यादा काम की बात project viability framework है — यानी गोदाम बनाने का पैसा कहां से आएगा और असल ब्याज लागत कितनी बचेगी। चार सरकारी योजनाओं को आपस में जोड़ा (converge) गया है:
- Agricultural Marketing Infrastructure (AMI): सब्सिडी को 25% से बढ़ाकर 33.33% कर दिया गया है, यानी प्रोजेक्ट लागत का एक-तिहाई हिस्सा सीधे सब्सिडी से कवर हो सकता है।
- Margin Money: समिति को अपनी जेब से लगाने वाली न्यूनतम राशि 20% से घटाकर 10% कर दी गई है — यानी शुरुआती पूंजी की ज़रूरत आधी रह गई है।
- Agriculture Infrastructure Fund (AIF): इसके तहत 3% ब्याज सबवेंशन (यानी छूट) मिलती है।
- NABARD Refinance: लोन देने वाले बैंकों — राज्य सहकारी बैंक और ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) — को NABARD से पुनर्वित्त सुविधा मिलती है, जिससे उनकी अपनी पूंजी लागत भी घटती है।
इन सबको जोड़ने पर योग्य PACS के लिए प्रभावी ऋण लागत (effective loan cost) घटकर लगभग 1% रह जाती है। सीधी भाषा में समझें: अगर सामान्य बाज़ार दर पर लोन 9-10% ब्याज पर मिलता, तो यहां सब्सिडी और सबवेंशन के बाद समिति को व्यावहारिक रूप से सिर्फ 1% के आसपास ब्याज चुकाना पड़ता है — बाकी बोझ सरकार और उसकी योजनाएं उठाती हैं।
असली उदाहरण से समझिए
महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले की नेरपिंगलई PACS का केस इस मॉडल की असली कमाई की झलक देता है। इस समिति ने 3,000 मीट्रिक टन क्षमता का वेयरहाउस बनाया, जिसमें करीब 300 किसानों ने भाग लिया और लगभग 32,000 बोरी सोयाबीन जमा कराई। समिति ने किसानों को गिरवी रखे अनाज के बदले करीब ₹4.50 करोड़ का अग्रिम (advance) दिया। बदले में समिति को अनुमानित ₹7.68 लाख सालाना किराया आय और करीब ₹54 लाख सालाना ब्याज आय होने का अनुमान है। यानी एक गोदाम, तीन तरह की कमाई — किराया, ब्याज, और किसान को समय पर सही दाम दिलाकर बना भरोसा।
FCI की Assured Hiring — पर शर्तों के साथ
गोदाम बना लेने भर से कमाई तय नहीं होती — उसमें अनाज आना और भरा रहना भी ज़रूरी है। इसी के लिए योजना में Food Corporation of India (FCI) द्वारा योग्य गोदामों की assured hiring (गारंटीशुदा किराये पर लेना) का प्रावधान है, लेकिन यह prescribed conditions पर निर्भर है। गोदाम को Warehousing Development and Regulatory Authority (WDRA) के मानकों पर खरा उतरना होता है — टिकाऊ और जंग-रोधी सामग्री, सही वेंटिलेशन व्यवस्था, और Project Management Consultants (PMC) द्वारा नियमित निरीक्षण व गुणवत्ता ऑडिट। जो गोदाम इन शर्तों पर खरे उतरते हैं, उन्हें ही FCI अपने स्टॉक के लिए किराये पर लेने की गारंटी देता है — यानी बनाना ज़रूरी शर्त है, पर काफी नहीं; मानक पूरे करना असली शर्त है।
PACS का चयन कैसे होता है — DCDC की भूमिका
हर PACS को अपने-आप यह लाभ नहीं मिल जाता। चयन एक तयशुदा संस्थागत ढांचे से होकर गुज़रता है:
- Inter-Ministerial Committee (IMC): राष्ट्रीय स्तर पर योजना की निगरानी।
- National Level Coordination Committee (NLCC): परिचालन समन्वय।
- State Cooperative Development Committee (SCDC): राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन।
- District Cooperative Development Committee (DCDC): ज़िला स्तर पर असल में PACS की पहचान और चयन इसी समिति के माध्यम से होता है।
यानी किसी भी PACS के सचिव या समिति के लिए पहला व्यावहारिक कदम यह जानना है कि उनके ज़िले की DCDC किस आधार पर PACS चुन रही है, और अपनी समिति को उस प्रक्रिया में शामिल कराना। कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में National Cooperative Development Corporation (NCDC) पूरी योजना का केंद्रीय संचालन करता है — इसकी हालिया संशोधन दिशा को हमने NCDC संशोधन विधेयक 2026 पर अपने विश्लेषण में विस्तार से कवर किया है।
ज़मीन की शर्तें
ज़मीन को लेकर योजना प्राथमिकता देती है कि PACS की अपनी मालिकाना ज़मीन हो, जो जलभराव वाले या वन क्षेत्र में न हो। अगर ज़मीन लीज़ पर ली गई है, तो लीज़ अवधि 20 वर्ष से अधिक होनी चाहिए। कई राज्यों में एक एकड़ ज़मीन की अनिवार्यता जैसी शर्तों में भी ढील दी गई है, ताकि छोटी PACS भी अपनी उपलब्ध ज़मीन के हिसाब से छोटी क्षमता का गोदाम बना सकें — जो सीधे उन समितियों के लिए राहत की बात है जिनके पास बड़ा भूखंड नहीं है।
हरियाणा के लिए इसका व्यावहारिक मतलब क्या है?
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि 3 सितंबर की यह अपडेट कोई नया, हरियाणा-विशेष कानून या HAFED का आदेश नहीं है — यह एक राष्ट्रीय योजना का ताज़ा कार्यान्वयन दस्तावेज़ है। लेकिन हरियाणा की PACS और CM-PACS के लिए इसके व्यावहारिक निहितार्थ साफ़ हैं:
पहला, हमने पहले दिखाया था कि हरियाणा में PACS की असल संख्या को लेकर सरकारी दस्तावेज़ों में ही 622 से 804 तक का फासला है। इस भंडारण योजना का लाभ लेने के लिए ज़रूरी है कि समिति स्पष्ट रूप से चिन्हित और सक्रिय PACS की सूची में हो — इसलिए यह डेटा-असमंजस सिर्फ आंकड़ों की बहस नहीं, बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन में सीधी बाधा बन सकता है।
दूसरा, गोदाम और वेयरहाउसिंग, CM-PACS के लिए अनुमत कई कारोबारी गतिविधियों में से एक है। हमने अपने पहले के विश्लेषण में हरियाणा की CM-PACS किस-किस तरह के कारोबार कर सकती हैं, इसकी पूरी सूची दी थी — भंडारण और वेयरहाउसिंग उसी सूची का एक व्यावहारिक और अब वित्तीय रूप से आकर्षक विस्तार बन गया है, खासकर जब ब्याज लागत सिर्फ 1% के आसपास आ रही हो।
तीसरा, इसे HAFED के अपने बड़े गोदाम नेटवर्क से अलग समझना ज़रूरी है। HAFED का ढांचा राज्य-स्तरीय, टॉप-डाउन खरीद-भंडारण मॉडल है, जबकि यह योजना पूरी तरह PACS-स्तरीय, बॉटम-अप मॉडल है — यानी गांव की समिति खुद मालिक और संचालक बनती है, किराया व ब्याज दोनों से कमाती है। यह फ़र्क समझे बिना समितियां इसे HAFED की योजना समझकर भ्रमित हो सकती हैं।
चौथा, यह मॉडल अकेला उदाहरण नहीं है जहां केंद्र सरकार PACS को नई आय के स्रोत जोड़ने के लिए सब्सिडी-आधारित मॉडल दे रही है। इसी तरह PM-KUSUM योजना के तहत भी PACS के लिए सोलर पावर और सब्सिडी आधारित आय मॉडल पहले से मौजूद है। जो समितियां एक योजना में आवेदन की प्रक्रिया समझ चुकी हैं, उनके लिए दूसरी समान योजनाओं में जाना अपेक्षाकृत आसान होता है।
सावधानी: क्या स्पष्ट नहीं है
इस अपडेट को पढ़ते हुए कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहला, आंकड़े राष्ट्रीय स्तर के हैं — 1,012 चिन्हित और 313 पूर्ण गोदामों में हरियाणा की कितनी PACS शामिल हैं, इसका राज्य-वार ब्यौरा इस PIB दस्तावेज़ में नहीं दिया गया है। दूसरा, “assured hiring” की गारंटी शर्तों पर निर्भर है — गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने वाला गोदाम FCI की हायरिंग सूची में शामिल नहीं होगा, इसलिए निर्माण की गुणवत्ता में ढिलाई सीधे कमाई पर असर डालेगी। तीसरा, DCDC के ज़रिए चयन का मतलब है कि यह प्रक्रिया आवेदन करने पर स्वतः नहीं, बल्कि ज़िला-स्तरीय समिति की मंज़ूरी पर निर्भर है — इसलिए समय पर सही चैनल से संपर्क करना ज़रूरी है।
निष्कर्ष: PACS के लिए अगला कदम क्या हो
जो PACS या CM-PACS गोदाम/वेयरहाउस प्रोजेक्ट पर विचार कर रही हैं, उनके लिए यह अपडेट एक तैयार-शुदा संदर्भ ढांचा (reference framework) है, न कि कोई नई योजना जिसे समझने में महीनों लगें। व्यावहारिक कदम तीन हैं — पहला, अपने ज़िले की DCDC से संपर्क कर यह जानना कि PACS की पहचान प्रक्रिया कहां तक पहुंची है। दूसरा, अपनी ज़मीन की स्थिति (मालिकाना या 20 वर्ष से अधिक की लीज़) स्पष्ट करना। तीसरा, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते समय शुरू से ही AMI सब्सिडी, AIF ब्याज सबवेंशन और NABARD पुनर्वित्त — तीनों को साथ जोड़कर वित्तीय मॉडल तैयार करना, ताकि प्रभावी ब्याज लागत का पूरा फायदा मिल सके। जिस गति से सरकार इस योजना को आगे बढ़ा रही है — पायलट के 9,750 मीट्रिक टन से आज के 1.80 लाख मीट्रिक टन तक — यह स्पष्ट है कि PACS-स्तरीय भंडारण अब सहकारी क्षेत्र की दीर्घकालिक प्राथमिकता बन चुका है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या यह योजना सिर्फ अनाज उगाने वाले राज्यों के लिए है?
नहीं। यह योजना पूरे देश की PACS के लिए है, चाहे राज्य में मुख्य फसल गेहूं-धान हो, कपास हो, या कोई अन्य कृषि उत्पाद। लक्ष्य 2 लाख multipurpose PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों तक पहुंचना है, इसलिए भंडारण की ज़रूरत वाली लगभग कोई भी योग्य समिति आवेदन कर सकती है, बशर्ते वह अपने ज़िले की DCDC प्रक्रिया से गुज़रे।
क्या PACS को गोदाम बनाने के लिए अपनी ज़मीन होना अनिवार्य है?
प्राथमिकता अपनी मालिकाना ज़मीन को दी जाती है, लेकिन लीज़ पर ली गई ज़मीन भी मान्य है बशर्ते लीज़ की अवधि 20 वर्ष से अधिक हो। कई राज्यों में एक एकड़ ज़मीन की सख़्त अनिवार्यता में भी ढील दी गई है, ताकि छोटी क्षमता की समितियां भी उपलब्ध ज़मीन के हिसाब से छोटा गोदाम बना सकें। ज़मीन जलभराव वाले या वन क्षेत्र में नहीं होनी चाहिए।
1% प्रभावी ब्याज दर का मतलब क्या हर PACS को मिलेगा?
नहीं, यह दर उन्हीं PACS के लिए है जो AMI सब्सिडी, AIF ब्याज सबवेंशन और NABARD पुनर्वित्त — तीनों सुविधाओं के लिए एक साथ योग्य पाई जाती हैं और जिनका प्रोजेक्ट DCDC व संबंधित बैंकों से मंज़ूर होता है। योग्यता, ज़मीन की स्थिति, और परियोजना रिपोर्ट की गुणवत्ता के आधार पर वास्तविक ब्याज लागत अलग-अलग समिति के लिए भिन्न हो सकती है।
FCI गारंटी से भंडारित अनाज किराए पर लेगा — इसमें क्या शर्त है?
FCI केवल उन्हीं गोदामों को किराये पर लेने की गारंटी देता है जो WDRA (Warehousing Development and Regulatory Authority) के गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते हैं — जैसे टिकाऊ व जंग-रोधी निर्माण सामग्री, उचित वेंटिलेशन, और PMC (Project Management Consultants) द्वारा नियमित निरीक्षण। मानक पूरे न करने वाला गोदाम बन तो सकता है, पर उसे assured hiring का लाभ नहीं मिलेगा।
क्या यह हरियाणा की CM-PACS के लिए कोई अलग/नई योजना है?
नहीं। यह एक राष्ट्रीय स्तर की योजना है जिसे केंद्र सरकार पूरे भारत में लागू कर रही है, और यह किसी हरियाणा-विशेष कानून, HAFED आदेश, या CM-PACS की अलग नई घोषणा से जुड़ी हुई नहीं है। हरियाणा की जो PACS या CM-PACS पात्रता की शर्तें पूरी करती हैं, वे इसी राष्ट्रीय ढांचे के तहत DCDC के माध्यम से आवेदन कर सकती हैं।
स्रोत: PIB — Decentralised Grain Storage Plan in Cooperative Sector, 3 सितंबर 2026












